
लोहार्गल जाओ तो अचार जरूर लाना
#lohargal ka achar
उदयपुरवाटी. अरावली की पहाडिय़ो के बीच स्थित शेखावटी के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल लोहार्गल की कैरी का अचार अपने खट्टे मीठे स्वाद के लिए दूर दूर तक प्रसिद्ध है। जिसके चलते यहां के अचार की मांग प्रदेश के अलावा अन्य दूसरे प्रदेशों में भी है। दूर दराज से लोहार्गल आने वाले लोग यहां का अचार ले जाना नहीं भूलते है। यहां की कैरी का एक सीजन स्थानीय लोगों को सालभर का रोजगार दे जाता है। राजस्थान के झुंझुनूं जिले के उदयपुरवाटी उपखंड के लोहार्गल गांव में आम के करीब 70 के करीब बगीचे हैं, जिनमें छह हजार के करीब पेड़ है। मई माह के अंतिम सप्ताह से बगीचों में आम के पेड़ों पर लगी कैरी को पकने से पूर्व अचार डालने के लिए तोड़ शुरू कर लिया जाता है।
#pickle of lohargal
लोहार्गल की कैरी का न केवल अचार बल्कि सब्जी भी बड़ी स्वादिष्ट बनती है। लोहार्गल के कैरी की पहचान उसके भीतर निकलने वाली झिल्ली (जाली) से होती है। लोहार्गल में सबसे ज्यादा अचार की दुकाने है। लोहार्गल की कैरी के अचार की पहचान उसकी महक व कैरी के अंदर आने वाली गुंथी हुई जाली से होते है। स्वादिष्ट अचार बनाने के लिए कई प्रकार के मसाले डाले जाते है। अचार में मैंथी, जीरा, हल्दी, मिर्ची, नमक, सौंप, कल्णुजी आदि मसाले डाले जाते हैं। इस अचार में सिरका का इस्तमाल नहीं किया जाता है।
#chirana ka achar
लोहार्गल की कैरी के दम पर पड़ौसी गांव चिराना अचार का बड़ा हब बना हुआ है। यहां प्रतिवर्ष लोहार्गल की कैरी का हजारों क्विंटल में अचार डाला जाता है। अचार की मांग के अनुरूप इसकी सप्लाई शेखावाटी क्षेत्र सहित जयपुर, हनुमानगढ़ बीकानेर, कलकता, सूरत तक होती है। लोहार्गल कैरी का अचार डालने का काम लोहार्गल व चिराना में एक दर्जन से अधिक परिवार वर्षो से करते आ रहे है।
साग-रोटा खाना है तो चले आओ चिड़ावा
चिड़ावा.चिड़ावा के पेड़ों के अलावा यहां का साग-रोटा भी देशभर में खूब चाव से खाया जाता है। इस लजीज डिश की बड़े-बड़े शहरों में भी डिमांड है। यहीं वजह हैकि महज चार माह की सीजन में पूरे जिले में करीब तीन करोड़ से ज्यादा का कारोबार हो जाता है। व्यवसायी से जुड़े लोगों ने बताया कि सागा-रोटा की सीजन सर्दी यानी नवंबर से फरवरी तक चलती है। अधिकांश दुकानों में सप्ताह के बुधवार, शुक्रवार और रविवार को साग-रोटा तैयार किए जाते हैं। कुछ दुकानों पर प्रतिदिन भी तैयार होने लगे। साग-रोटा की फुल और हॉफ डाइट तय कर रखी है। जिसमें फुल डाइड के 4सौ तथा हॉफ डाइट के दो सौ रुपए लिए जाते हैं। व्यवसाय से जुड़े लोग बताते हैं कि साग-रोटा करीब चार दशक से ज्यादा समय पहले चलन में आया था। जो कि घर-घर में दस्तक दे चुका है। देशी घी से बना होने के कारण सेहत को भी नुकसान नहीं पहुंचाता।
पकौड़ी हो तो गुढ़ागौडज़ी जैसी
गुढागौडज़ी. कस्बे में सरकारी अस्पताल के बाहर बिकने वाली पकौड़ी अपने अनोखे स्वाद के लिए काफी प्रसिद्ध है। गुढागौडज़ी के रतनलाल यहां पिछले 35 वर्षों से पकौड़ी बना रहे है। मूंग और मोठ की दाल से बनने वाली इन पकौडिय़ों का स्वाद आस-पास के गांवों तक भी चखा जाता है। रतनलाल शर्मा ने बताया कि खासकर सर्दियों में इनकी मांग ज्यादा रहती है। इन दिनों ग्राहकों की लाइन इनकी दुकान के आगे हर वक्त लगी रहती है।
चिड़ावा के पेड़ों का जायका अलग, देशभर में डिमांड
चिड़ावा.झुंझुनूं जिले का चिड़ावा शहर लजीज पकवानों के कारण देशभर में पहचान रखता है। यहां के पेड़ों ने अलग पहचान बनाई है। प्रतिदिन चिड़ावा से लाखों के पेड़े ब्रिकी होते हैं। जिसे खरीदने के लिए बाहर से भी लोग पहुंचते हैं। मिठाई में चिड़ावा का पेड़ा ब्रांड बन चुका है। जिसका सालाना व्यापार 50 करोड़ के बीच पहुंच जाता है। इस व्यवसायी से चार-पांच हजार लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार भी मिल रहा है। मिठाईव्यवसायी रजनीश राव और शीशराम हलवाई बताते हैं, चिड़ावा में करीब नौ दशकों से पेड़े बनाए जा रहे हैं। जिसके स्वाद व शुद्धता में कोई फर्क नहीं आया। यहां के पेड़ों की विशेषता है कि लंबे समय तक खराब भी नहीं होते। जिसकी वजह शुद्ध मावा, यहां का पानी, दूध व उसकी घुटाई को माना जाता है।
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Published on:
01 Jan 2021 11:06 pm
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