
इस गांव की दरगाह में भरता है जन्माष्टमी का मेला
चिड़ावा.राजस्थान के झुंझुनूं जिले के नरहड़ गांव का अलग ही ऐतिहासिक महत्व है। यहां की दरगाह कौमी एकता की मिशाल है । खादिम अजीज पठान और शाहिद पठान ने बताया कि भारत में जब सूफी संतों का आगमन हुआ उस समय शक्करबार पीर बाबा भी सब्जवारी इरान की तरफ से भारत में आए। वे यहां रूके तथा दीन-दुखियों की मदद करते रहे। धीरे-धीरे इनकी प्रसिद्धि फैलने लगी। बाबा ने नरहड़ में 752 साल पहले समाधि ली तब से लेकर हर साल उर्स होता है तो जन्माष्टमी पर मेला भी लगता है।
# narhad village
गांव चौहानों के समय जैन धर्म का प्रसिद्ध केंद्र था । यहां से जैन धर्म के प्रसिद्ध तीर्थों की मूर्तियां मिली थी जो आज भी अल्बर्ट हॉल जयपुर की शोभा बढ़ा रही हैं। वहीं मूर्तियां पिलानी में भी लगी हुई हैं। गांव में समय-समय पर खुदाई करते मूर्तियों के अवशेष दिखाई पड़ जाते हैं। हालांकि गांव का हजारों साल का इतिहास खंडहरों के रूप में दफन हो चुका है। ग्रामीणों का कहना है कि खुदाई की जाए तो पुरात्व की सामग्री व हजारों साल पुराना इतिहास निकलकर सामने आ सकता है।
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नरहड़ गांव को कौमी एकता की मिशाल कहा जाता है। यहां अनेकों प्राचीन मंदिर हैं। शिव मंदिर, बिहारी जी का मंदिर, नरियावाला बालाजी, शीतला मंदिर तो हैं ही साथ ही गांव में हाजी हजरत शक्करबार पीर बाबा की प्रसिद्ध दरगाह भी है। जहां जन्माष्टमी पर मेला भी लगता है।
अंग्रेजों की सेना में भी दी सेवाएं-
गांव के जवानों ने स्वतंत्रता संग्राम, समाजसेवा, किसान आंदोलन में अपनी भूमिका निभाई। ग्रामीण रामसिंह बगराणिया बताते हैं, सैनिक हरसुखराम, हवलदार गोपाल, सूबेदार मेजर गणेशाराम, हवलदार खेताराम, हवलदार गोरू जुलाहा, सूबेदार सागरराम, श्योनारायण धायल, हवलदार गोकुलराम आदि अंग्रेजों की सेना में भर्ती हुए थे। गणपतराम बगराणिया भी स्वतंत्रता आंदोलन के लिए लड़ाई लड़ी। जिसे राजद्रोह के आरोप में जेल की हवा भी खानी पड़ी। गांव के रामकुमार सिंह मैजर के पद पर रह चुके हैं।
अंग्रेजों के शासन में बना था डाकघर-
गांव में अंग्रेजों के जमाने का डाकघर फिलहाल भी सुचारू रूप से चल रहा है। गांव में अंग्रेजों के जमाने का पुलिस थाना भी था, जो कि साल 1958 तक थाना रहा। जिसे बाद में पिलानी स्थानांतरित कर दिया गया। साल 1974 तक पुलिस चौकी रही। फिलहाल थाने का भवन जर्जर हो चुका है। गांव में प्रारंभ में बिड़ला स्कूल संचालित होती थी। जिसे 1951 में प्राइमरी स्कूल का दर्जा दिया गया। गांव में सहकारी समिति, बिजली घर, औषधालय, सरकारी अस्पताल, पशु चिकित्सालय, बीएसएनल एक्सचेंज, आंगनबाड़ी केंद्र, जलदाय विभाग, भू-अभिलेखागार आदि सुविधाएं उपलब्ध हैं।
राजनीति में भी रहा गांव का दखल-
नरहड़ गांव में पहली पंचायत साल 1958 में बनी। जिसके पहले सरपंच विश्वेश्वर सिंह थे। साल 196 1 में देवरोड़ गांव के हटने से बाद पहले और दूसरे सरपंच नागरमल स्वामी बने। चिड़ावा पंचायत समिति के चौथे व नरहड़ गांव के पहले प्रधान साल
1985 में निहालसिंह रणवां बने। सुनीता स्वामी और मीरा देवी भी प्रधान रह चुकी हैं। मीरा देवी पूर्व प्रधान निहालसिंह की पत्नी हैं।
गांव की मुख्य समस्याएं-
-गंदे पानी की निकासी नहीं।
-गांव के कुछ मोहल्लों में पेयजल की समस्या।
-गांव के सौंदर्यकरण के लिए लगी स्ट्रीट लाइट सही तरीके से काम नहीं कर रही।
-सुलताना का बास से नरहड़ तक सड़क का डामरीकरण नहीं हुआ।
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फैक्ट फाइल-
2011 की जनगणना
कुल घर-1 हजार 8 91
कुल आबादी-10 हजार 71
पुरुष-5 हजार 136
महिला-4 हजार 935
औसत साक्षरता दर-58 प्रतिशत
Published on:
06 Dec 2020 10:45 pm
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