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धोरों में उपजा राजस्थानी मावा, इसकी मिठास का है हर कोई दीवाना , आप भी इसके गुण जानकर हो जाएंगे हैरान

बीड़ वन क्षेत्र के 1047.48 हैक्टेयर में क्षेत्रफल में फैले पेड़ों पर पील फल बड़ी तादाद में नजर आ रहे हैं।

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jhunjhunu peel fruit

धोरों में उपजा राजस्थानी मावा, इसकी मिठास का है हर कोई दिवाना, आप भी इसके गुण जानकर हो जाएंगे हैरान

बगड़. झुंझुनू बीड़ क्षेत्र में इन दिनों राजस्थानी मावा के नाम से जाने जाना वाला रसीला फल अपनी मिठास से सब का मन मोह रहा है। बीड़ वन क्षेत्र के 1047.48 हैक्टेयर में क्षेत्रफल में फैले पेड़ों पर पील फल बड़ी तादाद में नजर आ रहे हैं। जहां एक ओर भीषण गर्मी के चलते लोग पानी की आपूर्ति एवं गले को तर करने के लिए नींबू, बील, आम, तरबूज जैसे फलों का सेवन करते है। वहीं दूसरी ओर गर्मी के मेवे कहलाने वाले पील, जिसे पिल्लू के नाम से भी जाना जाता है। पेड़ों पर लगने लगे है। आस-पास के क्षेत्र में पील झुंझुनू बीड़ वन क्षेत्र में ही देखने को मिलते है। जो झुंझुनू-बगड़ के बीच में वन क्षेत्र में है। बीड़ में जाळ के पेड़ की शाखा पर इन दिनों छोटे-छोटे पील के फल अपनी अलग ही छटा बिखेर रहे है। बीड़ में लगे बहुतायत जाळ के पेड़ पर पील ज्येष्ठ महीने की गर्मी के मौसम में ही लगते हैं।

यह फल केवल दो महीने ही लगता है। लू के थपेड़ों से पक कर खाने लायक हो जाते हैं। युवा, बुजुर्ग, बच्चे सब पील को खाने का आनंद ले रहे है। झुंझुनू बीड़ वन विभाग क्षेत्र के बीच हरी-भरी जाळ के पेड़ पर लगे फल को सुबह उठते ही तोडऩे ग्रामीण पुरुष और महिलाओं सहित छोटे बच्चे निकल जाते हैं। इन दिनों बीड़ के चारों तरफ के गांवो से लोग पील तोडऩे पहुंच रहे हैं। आस-पास के क्षेत्रों के ग्रामीण इलाकों के अलावा शहर के लोग जो अपने निजी वाहनों से आवागमन करते है। वे भी रुक कर पील तोड़ते नजर आते है। शहरों में तो लोग पील को पहचानते ही नहीं है। लेकिन जो बुजुर्गो के पास बैठते है या फिर जिनकी रिश्तेदारी आस-पास के गांवों में है वे ही पील का स्वाद जानते है।

ग्रामीणों की माने तो लाल, हरे, पीले एवं बैंगनी रंग के इस फल के स्वाद के साथ गर्मी के मौसम में इसे खाने से गर्मी में लू से बचाव होता है। साथ ही यह फल पशुओं को चराने वाले ग्वालों की प्यास भी बुझाता है। ग्रामीण एवं वन कर्मियों का कहना है कि इस फल को खाने के लिए दूर-दराज से लोग आते है।

औषधीय गुणों से युक्त है पील
राजस्थानी मावा के नाम से जाने जाने वाला पील फल प्रकृति का अनमोल औषधीय फल भी है। गांव के बुजुर्ग इस रेगिस्तानी अंगूर का इतिहास बताते हैं कि आज से करीब 50 वर्ष पूर्व जब संसाधनों का अभाव था तब इन पीलो को तोडकऱ झुंझुनू, बगड़, चिड़ावा सहित आसपास के शहरों में ऊंट गाडों पर लोग बेचने जाया करते थे और उसके बदले उन्हें अनाज या घरेलु सामान मिलता था। तब लगभग प्रत्येक घर से कोई न कोई सदस्य पील बेचने जरूर जाया करता था। पूरे दिन भर में एक सदस्य 5 से 10 किलों तक पील तोड़ लेता था फिर खराब ना हो इसके लिए नए कोरे घड़े में रखी जाती थी। जिस वजह से यह 7 से 10 दिन तक खराब नहीं होती थी।

इनकी मिठास भी बहुत होती है। जिस कारण आज भी उस इलाके के बुजुर्ग बीड़ क्षेत्र की पील को याद करते है। बीड़ के बीच हरी-भरी जालनुमा पेड़ पर ग्रामीण सुबह होते ही फल तोडऩे व खाने के लिए निकल जाते है। इन दिनों बीड़ क्षेत्र में इस फल की बहुतायत है। ग्रामीण बताते है कि इस बार जो पील है वह कई सालों बाद ही देखी गई है। इसको पशु-पक्षी नहीं खाते है। जिस कारण ही बहुत ज्यादा फैलती है। जाळ को पानी की बहुत ही कम आवश्यकता होती है। यह फल दो महीने ही लगता है और जाळ के पेड़ भयंकर गर्मी में हरी-भरी रहती है। ग्रामीणों ने बताया कि पील एक औषधीय फल है। इसे खाने से पेट संबंधी रोग नहीं होते। कई रोगों का रामबाण उपचार माना जाता है।


इनका कहना है...
-पहले के युवा, बुजुर्ग एवं महिलाएं कोसों दूर से पील खाने बीड़ में आया करते थे। लेकिन आजकल के युवा इन प्राकृतिक फलों से दूर होते जा रहे है। पील प्यास बुझाने में भी सहायक होती है।
गोवर्धन सिंह गुर्जर, पूर्व उपसरपंच, सोती

-कन्जर्वेशन रिजर्व बीड़ झुंझुनू में हजारों की संख्या में जाळ के वृक्ष है। जाळ का वृक्ष एवं पीलू दोनों ही औषधीय गुणों से भरपूर है। जाळ के वृक्षों के संरक्षण के ओर अधिक प्रयास विभाग द्वारा किए जा रहे है।
अमित सैनी, कन्जर्वेशन रिजर्व बीड़ झुंझुनू प्रभारी

- इसके खाने से कब्ज जैसी बीमारीयां दूर रहती है। वहीं पेट भी साफ रहता है। पहले की तुलना में वर्तमान में लोग पील खाने के शौकीन नहीं है। -सुभाष गुर्जर, ग्रामीण सोती

-पील खाने के लिए आने वाले दूर दराज के गांवों के लोगों की पहले सुबह शाम भीड़ लग जाया करती थी। महिलाओं के साथ बच्चे बुजुर्ग भी बड़ी संख्या में पील खाने आया करते थे। वर्तमान में कम ही लोग पील खाने आते है।
चिरंजीलाल गुर्जर, ग्रामीण सोती

पहले की तुलना में कम ही लोग पील खाने बीड़ में जाते है। पहले तो झुंझुनू, बगड़, मंड्रेला, लालपुर, कासीमपुरा, बुडाना सहित अन्य गांवों के लोगों का सुबह शाम मेला सा लग जाता था।
रेखाराम मेघवाल, ग्रामीण सोती

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