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गर्मियों में छाई रोहिड़ा के पुष्पों की बहार

—फूल, पत्ते, फलियां व छाल कई वर्षों तक उपयोगी—पेड़ की लकड़ी सागवान से भी अधिक उपयोगी सूखे इलाके का आभूषण कहलाने वाला वृक्ष रोहिड़ा इन दिनों अपने सौंदर्य की छटा बिखेर रहा है। रंगों के पर्व होली से ही इस पर पुष्प पल्लवित होने लग जाते हैं। ऐसा लगता है कि मानो पेड़ों से पुष्प वर्षा हो रही हो। चूरू जिले के सरदारशहर, रतनगढ़, राजगढ़, तारानगर क्षेत्र को रोहिड़ा के फूलों का हब कहा जाता है।

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गर्मियों में छाई रोहिड़ा के पुष्पों की बहार

गर्मियों में छाई रोहिड़ा के पुष्पों की बहार

सूखा सहन करने की अपार क्षमता
किसान रिछपाल कुड़ी ने बताया कि रोहिड़ा वृक्ष में सूखा सहन करने की अपार क्षमता होती है। कम बरसात वाले क्षेत्र में भी यह अपना अस्तित्व बनाए रखता है। गर्मी में जब अन्य फूल मुरझाने की अवस्था में रहते हैं तो यह फूलों से लदकद रहता है। वनरक्षक विनोद यादव ने बताया कि रोहिड़ा का पेड़ सबसे ज्यादा मजबूत पेड़ होता है। इसकी लकड़ी फर्नीचर बनाने में काम में ली जाती है।

आयुर्वेद में है बहुत उपयोगी
रोहिड़ा पेड़ का हर हिस्सा का आयुष चिकित्सा में काम आता है। आयुष चिकित्सक डॉ.बाबूलाल शर्मा का कहना है कि पेड़ के पुष्प, तना, छाल बहुत उपयोगी हैं। यह लिवर, हार्ट व समस्त उदर व कृमि रोगों में यह कारगर है। इसके पुष्प से रोहितकारिष्ट, कुमार्यासव, कालमेघासव आदि दवा बनती है। यह भूख की कमी, मोटापा, दमा, पुराना बुखार, मधुमेह व बवासीर सहित अन्य रोगों के इलाज के काम आता है। आयुर्वेद विभाग द्वारा कच्ची औषधियों की आपूर्ति हेतु निविदाएं जारी की जाती हैं। औषधि आपूर्ति के बाद उनसे राजकीय रसायन शालाओं द्वारा औषधियों का निर्माण किया जाता है।

40 साल पहले बना राज्य पुष्प
इसकी कई खूबियों को देखते हुए इसे ़1983 में रोहिड़ा को राज्य पुष्प घोषित किया गया। इसके पेड़ को रेगिस्तान का सागवान भी कहते हैं। इसकी उम्र अधिक होने पर इसके फू ल, पत्ते, फ लियां व छाल कई वर्षो तक आयुर्वेदिक दवाइयों में काम आती है। रोहिड़ा के पुष्प खूबसूरत लेकिन सुगंधरहित होते हैं।


गीले व सूखे पुष्पों की होती है बिक्री
किसानों का कहना है कि गीले व सूखे दोनों पुष्पों की बिक्री होती है। बहुतायत वाले स्थानों से आयुर्वेद दवा बनाने वाले लोग ले जाते हैं। इनके पुष्प व छाल हजारों रुपए प्रति किलो बिकते हंै। पेड़ सूख जाने लकड़ी के भाव बेचा जाता है। इसकी लकड़ी सागवान से भी अधिक उपयोगी व अधिक उम्र वाली होती है। यह 155 -160 रुपए फीट के हिसाब से बिकती है।

इनका कहना है-
कम बारिश व कम पानी वाले क्षेत्रों में रोहिड़ा का पेड़ अधिक पनपता है। बेशकीमती लकड़ी के साथ यह आयुर्वेद व मरुस्थल का आभूषण भी कहा जाता है। झुंझुनूं जिले में लगभग 10 -15 हजार पेड़ है जो उदयपुरवाटी पहाड़ी व मैदानी क्षेत्र के गांवों में अधिक पाए जाते हैं।
शीशराम जाखड़ , सहायक निदेशक (उद्यान), झुंझुनूं ।

अरुण शर्मा — पचलंगी