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राजस्थान के झुंझुनूं शहर में बिना मिट्टी के उगते हैं धनिया, मैथी और पालक

नारियल के बुरादे (कोको पीट) व क्लेबॉल्स को ग्रोइंग के रूप में काम लिया जाता है। सांचेनुमा ट्रे में छोटे-छोटे गमले (नेट पोट) में ग्रोइंग मीडिया के साथ सब्जियों के बीज डाले जाते हैं। न्यूट्रिशन वाला पानी देकर इसी ट्रे में अंकुरण कराया जाता है।

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राजस्थान के झुंझुनूं शहर में बिना मिट्टी के उगते हैं धनिया, मैथी और पालक

राजस्थान के झुंझुनूं शहर में बिना मिट्टी के उगते हैं धनिया, मैथी और पालक

झुंझुनूं ञ्च पत्रिका. शहर के रहने वाले एक परिवार ने कमाल किया है। जल संवर्धन कृषि (हाइड्रोपोनिक फार्मिंग) के जरिए इस परिवार ने घर की छत पर पौष्टिक सब्जियां उगा दी है। खास बात यह है कि इसमें ना मिट्टी की जरूरत होती है और ना ही निराई-गुड़ाई की। इस तकनीक से उगाई जाने वाली सब्जियां मिट्टी जनित रोगों से भी मुक्त होती है। जल संवर्धन कृषि में मिट्टी का कहीं कोई उपयोग नहीं होता। नारियल के बुरादे (कोको पीट) व क्लेबॉल्स को ग्रोइंग के रूप में काम लिया जाता है। सांचेनुमा ट्रे में छोटे-छोटे गमले (नेट पोट) में ग्रोइंग मीडिया के साथ सब्जियों के बीज डाले जाते हैं। न्यूट्रिशन वाला पानी देकर इसी ट्रे में अंकुरण कराया जाता है। पौध तैयार होते ही गमलों को प्लांट में शिफ्ट कर दिया जाता है। यहां ऑटोमेटिक पंप के माध्यम से न्यूट्रिशन वाला पानी लगातार पौधों को मिलता रहता है। इससे वे तेजी से बढ़ते हैं।
शहर में खेमी शक्ति रोड पर महेश टॉकीज के सामने एडवोकेट इंदुभूषण शर्मा के घर पर तैयार हाइड्रोपोनिक फार्म आधुनिक खेती की मिसाल बन गया है। शारदा देवी, उनकी बहू मोनिका शर्मा और बेटे आलोक व पंकज स्वयं यूनिट की देखभाल करते हैं। बकौल पंकज, छह महीने में इस प्लांट से एक लाख रुपए की पैदावार ले ली। इस प्लांट पर अब तक धनिया, मैथी, पालक, भिंडी, करेला, टमाटर, खरबूजा आदि चलन की सब्जियां तो उगाता ही है। इनके साथ ही मांग के अनुरूप हेल्थ सप्लीमेंट के लिए प्रसिद्ध केल, रोमन लेटूस, रोज मेरी, थाईस, पार्सले आदि भी उगा रहा है। हाइड्रोपोनिक फार्म में पैदावार तैयार करने में 40 से 55 दिन का समय लगता है। इस प्लांट में 4300 गमले (नेट पोट) हैं। एक गमले में औसत 125 ग्राम धनिया की पैदावार होती है। इस तरह भी दो महीने से भी कम समय में करीब 450 किलो धनिया पैदा कर सकते हैं। बिजली आदि का खर्चा पांच हजार रुपए मासिक होता है।

#special farming in jhunjhunu
पानी से मिलते है न्यूट्रिशन
हाइड्रोपोनिक फार्मिंग में पौधों को पानी के जरिए सूक्ष्म पोषक तत्व पहुंचाए जाते हैं। इन तत्वों में लोहा, कोबाल्ट, क्रोमियम, तांबा, आयोडीन, मैंगनीज, सेलेनियम, जस्ता और मोलिब्डेनम आदि शामिल हैं। 1000 स्क्वायर फीट एरिया में हाइड्रोपोनिक कृषि करने के लिए करीब सात लाख रुपए खर्च होते हैं। इसमें क्लाइमेट कंट्रोल पॉलीहाउस, हाइड्रोपोनिक यूनिट, पंपिंग सेट, वाटर टैंक, फोगर, मोनो व्हाइट नेट आदि तैयार करना होता है।

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एक्सपर्ट व्यू
मैं खुद यह खेती देखकर आया हूं। इसी प्रकार की खेती अपने जिले में भी संभव है। यह नई तकनीक है। जल संवर्धन कृषि में सामान्य खेती की तुलना में 94 प्रतिशत पानी की बचत कर सकते हैं। इसमें पौधों तक पौषक तत्व पहुंचाने के लिए पाइप के जरिए पानी प्रवाहित होता है। यही पानी पाइपों के जरिए वापस टैंक में पहुंच जाता है। यहीं से पंपिंग कर इसे पुन पोषक तत्वों के साथ पौधों की जड़ों में स्प्रे कराया जाता है।
-डॉ दयानंद, कृषि वैज्ञानिक, केवीके आबूसर