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बंधेज व्यवसाय में कोरोना से 90 प्रतिशत गिरावट

  कारीगरों की बढ़ी परेशानी, वैवाहिक आयोजन और फेस्टिवल सीजन में होता है करोड़ों का व्यापार

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बंधेज व्यवसाय में कोरोना से 90 प्रतिशत गिरावट

बंधेज व्यवसाय में कोरोना से 90 प्रतिशत गिरावट

नंदकिशोर सारस्वत

जोधपुर. विश्व भर में अपनी विशिष्ट पहचान कायम करने वाले जोधपुरी बंधेज की मांग कोरोनाकाल में लगातार घटकर मात्र 10 प्रतिशत से भी कम रह गई है। करीब 100 करोड़ से अधिक वार्षिक टर्न ओवर वाले बंधेज व्यवसाय में जोधपुर में बनी बंधेज की साडिय़ां, सलवार सूट, ओढ़नियां, चुनरी महिलाओं व युवतियों में सर्वाधिक लोकप्रिय है। वैवाहिक सीजन और फेस्टिव सीजन में सर्वाधिक मांग वाला बंधेज की मांग न के बराबर हो चुकी है। पहले ही परम्परागत कारीगरों की कमी और उसपर कोरोना संक्रमण जैसे हालात रहे तो बंधेज की प्राचीन कला संस्कृति पूरी तरह लुप्त होने का खतरा भी पैदा हो गया है। जोधपुर में बंधेज तैयार करने वाले चड़वा (रंगरेज ), चुंदड़ीगर व छीपा परिवार के करीब एक हजार लोग जुड़े हैं। साथ ही बंधेज व्यवसाय से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े करीब पांच हजार लोगों को रोजगार मिल रहा है।

हर खुशियों की मौके की शान
हर त्योहार-उत्सव व खुशियों के मौकों पर महिलाओं की ओर से केसरिया, नीले और लाल रंग की साडिय़ां, दुपट्टे पहनने का प्रचलन है। पुरुषों में अलग-अलग रंग के बंधेज के साफे तो हर विवाह समारोह में प्रयोग होते है। जोधपुर में निर्मित बंधेज की अन्य किस्म जैसे पोमचा, पीलिया, पतंगभात, पचरंगा, सतरंगा, लहरिया, मोठड़ा व चूंदड़ी भी काफी लोकप्रिय है।

जोधपुर शासकों का मिला संरक्षण

बंधेज की रंगाई और बंधाई का कार्य 12 वीं शताब्दी में गुजरात में बाघेला राजाओं के शासनकाल में बंधेज पल्लवित और पोषित हुआ। गुजरात के बाद जोधपुर के शासकों ने 18 वी शताब्दी में इस कला को संरक्षण प्रदान किया ।
डॉ. महेन्द्रसिंह तंवर 'खेतासरÓ इतिहासविद्

बंधेज कला को बचाना है तो एकेडमी खोले सरकार : पद्मश्री मोहम्मद तैय्यब

कोरोना की लहर और लॉकडाउन में 90 प्रतिशत बंधेज व्यवसाय खत्म हो चुका है। तेजी से खत्म हो रहे बंधेज व्यवसाय और बंधेज से जुड़ी कला को बचाना है तो सरकार को परम्परागत प्रशिक्षण देने के लिए एकेडमी खोलना चाहिए। बारीक और पारम्परिक बंधेज का कार्य अपने आप में अलग और मुश्किल काम है। दूसरे देशों में निर्यात तो कोविड के कारण पहले ही बंद है। विवाह आयोजन बंद होने और फेस्टिव सीजन में मांग ना के बराबर होने से कारीगरों का गुजारा भी मुश्किल हो गया है। बीच में लॉकडाउन खुलने पर जितने भी ऑर्डर मिले थे लेकिन सब कैंसिल हो गए।
-मोहम्मद तैय्यब खान, बंधेज के लिए पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित

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