223 साल पहले राजस्थानी भाषा में अनुवादित हुआ आईन-ए-अकबरी ग्रन्थ
जोधपुर. राजस्थानी शोध संस्थान चौपासनी में अबुल फ जल कृत आईन-ए-अकबरी के राजस्थानी अनुवाद की हुई पाण्डुलिपि सुरक्षित है जो 1795 ई. की है। दुर्लभ पाण्डुलिपि का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि जयपुर नरेश सवाई प्रतापसिंह के आदेश से गुमानीराम कायस्त ने ग्रन्थ का अनुवाद राजस्थानी में किया था। फ ारसी भाषा से राजस्थानी भाषा में अनुवादित आईन-ए-अकबरी में कायस्त गुमानीराम ने सम्राट अकबर की शासन व्यवस्था के विभिन्न विभागों के साथ ही अनेक सूचनाएं समाविष्ट की हैं। इस ग्रन्थ में बादशाह अकबर के समय राजकीय शालाओं के वर्णन के साथ ही राजकोष, रत्नकोष, उस समय की टकसाल व्यवस्था और उसमें लगे विभिन्न पदाधिकारी, अकबर का सैन्य प्रशासन एवं उनके प्रशासनिक विभागों में फ रासखाना, पाकशाला, मेवाखाना और राज्य के वैभव की विभिन्न सामग्रियों का वृतान्त देने के साथ सोना, चांदी आदि धातुओं के पहचान सम्बन्धित महत्वपूर्ण जानकारी देने के साथ उस समय इनके मूल्य को भी लिपिबद्ध किया गया है।
कायस्त गुमानीराम ने बहुत ही सुन्दर लिपि में आईने अकबरी ग्रन्थ का राजस्थानी में अनुवाद किया है। ग्रंथ में बादशाह अकबर के नित्यकर्म से जुड़ी दैनिक हलचलों का विस्तार पूर्वक विवरण दिया है। साथ ही उस समय उनके वतन में माकूल कानून व्यवस्था और विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्री पर भी प्रकाश डाला है। खाद्य सामग्री में विभिन्न प्रकार के फ ल, शाक-सब्जी का उल्लेख विभिन्न मौसम के अनुसार किया गया है। उस समय उनका क्या मूल्य था वह भी सारणी के माध्यम से दर्शाया गया है। इस ग्रन्थ में कीमत दाम में अंकित की गई है। फ ारसी भाषा से राजस्थानी में लिपिबद्ध ऐसे महत्वपूर्ण विषयक ग्रन्थ की अपनी अलग ही पहचान है और 18वीं शताब्दी में इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ का राजस्थानी में अनुवाद होना आज के युग में राजस्थानी भाषा की महत्ता को उजागर करता है।
शोध संस्थान में संरक्षित हैं 18 हजार ग्रंथ
मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट, जोधपुर एवं चौपासनी शिक्षा समिति, जोधपुर की ओर से संचालित शोध संस्थान में 18 हजार दुर्लभ ग्रन्थों का संग्रह संरक्षित है जिसमें प्राचीन जैन विषयक ग्रन्थ, चारण साहित्य के प्राचीन दोहे, गीत, छप्पय, निसांणी, वचनिका, झमाल, राजस्थानी गद्य की सभी विधाएं, साहित्य-शास्त्र हिन्दी राजस्थानी कृतियों के अलावा ज्योतिष, शालिहोत्र एवं आयुर्वेद के प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थ शामिल हैं।
राजस्थानी भाषा की महत्ता उजागर
फ ारसी भाषा से राजस्थानी में लिपिबद्ध ऐसे महत्वपूर्ण विषयक ग्रन्थ की अपनी अलग ही पहचान है और 18वीं शताब्दी में इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ का राजस्थानी में अनुवाद होना आज के युग में राजस्थानी भाषा की महत्ता को उजागर करता है।
डॉ. विक्रमसिंह भाटी सहायक निदेशक, राजस्थानी शोध संस्थान चौपासनी