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जोधपुर. डॉ. सम्पूर्णानंद मेडिकल कॉलेज के अधीन संचालित मथुरादास माथुर अस्पताल की कैथ लैब में पहली बार चार बच्चों की एंजियोग्राफी की गई। चारों बच्चे ह्रदय की जन्मजात बीमारी पीडीए से ग्रसित थे। इस बीमारी में हृदय की धमनी में एक छेद खुला रहने से अशुद्ध व शुद्ध रक्त आपस में मिलता रहता है। एंजियोग्राफी में तारों के द्वारा डिवाइस की मदद से इस छेद को आसानी से बगैर सर्जरी के बंद कर दिया गया। चारों बच्चों को मंगलवार छुट्टी दी जाएगी। प्रदेश के सरकारी अस्पताल में बच्चों की एंजियोग्राफी का यह पहला मामला बताया जा रहा है। अब तक एेसे बच्चों को अहमदाबाद स्थित निजी अस्पतालों में रैफर किया जाता था। वैसे प्रति एक हजार बच्चों में से आठ को जन्मजात हृदय रोग की आशंका रहती है।
अस्पताल के कार्डियोथोरेसिक सेंटर में कैथ लैब है जहां बड़े मरीजों की एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी व बाइपास सर्जरी की जाती है। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. जेपी सोनी और डॉ. संदीप चौधरी के नेतृत्व में पहली बार बच्चों की एंजियोग्राफी की गई। बड़े मरीजों की एंजियोग्राफी में जहां हाथ या पैर में वायर डालकर हृदय के रक्त प्रवाह में आनी वाली बाधा या क्लॉट के बारे में जांच की जाती है। एंजियोग्राफी में उनके हृदय से संबंधित जन्मजात बीमारियों को ठीक किया जाता है। दूसरे शब्दों में बच्चों के हृदय के एेसे छेद को बंद किया जाता है, जो किसी विकृति की वजह से जन्म के बाद खुले रह जाते हैं।
तीन छेद खुले रह जाते हैं दिल
जन्मजात हृदय रोगों से पीडि़त बच्चों में हृदय के कुछ छेद खुले रह जाते हैं। इसमें मुख्यत: तीन छेद खुले रहने की विकृति अधिक होती है। हृदय में चार चेम्बर होते हैं। ऊपर के दोनों चेम्बर यानी ऑरिकल के बीच अगर छेद खुला रह जाए तो उस बीमारी को एएसडी कहते हैं। नीचे के दोनों चेम्बर यानी वेंट्रिकल के बीच खुले छेद की बीमारी को वीएसडी कहते हैं। दो बड़ी धमनियों एरोटा और प्लमोनरी आर्टरी के बीच छेद बंद नहीं होने की बीमारी को पीडीए कहते हैं।
चारों बच्चों को आज मिलेगी छुट्टी
एमडीएम अस्पताल आए चारों बच्चे पीडीए से ग्रसित थे। इसमें एरोटा (शुद्ध रक्त की धमनी) और प्लमोनरी आर्टरी (अशुद्ध रक्त की धमनी) का रक्त आपस में मिलने से बच्चों के हार्ट पर जोर पडऩे के साथ ब्लड प्रेशर भी बढ़ जाता है। डॉ. संदीप ने कैथ लैब में एक डिवाइस की मदद से हृदय तक एक जालिका पहुंचाकर छेद को बंद कर दिया। बच्चों की रक्त आपूर्ति सामान्य है। अब तक एेसे बच्चों के निजी अस्पताल इलाज पर १.५० से लेकर २ लाख रुपए खर्च होते थे।
Published on:
22 Aug 2017 10:01 am
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