
chopasni school of jodhpur
- चौपासनी स्कूल में आज भी कायम है आधुनिक शिक्षा के साथ पुरानी संस्कृति
दीनबंधु वशिष्ठ/ जितेंद्रसिंह राठौड़. अंग्रेजों के जमाने से आजादी के संघर्ष तक देश की शिक्षा में बहुत कुछ बदलाव हुए, लेकिन जोधपुर में अंग्रेजों के जमाने से चल रहा चौपासनी स्कूल में शिक्षा के साथ-साथ पुरानी परम्पराओं को तोड़ा नहीं गया हैं। विद्यालय की खास बात यह है कि यहां इतिहास देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले रणबांकुरों से भरा पड़ा है और अंग्रेजी सल्तनत में विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित गोविंद सिंह से लेकर परमवीर चक्र विजेता मेजर शैतान सिंह सहित कई वीरता पुरस्कार से सम्मानित अफसर यहां से निकले हैं। इतना जरूर है कि पहले यहां राज परिवारों, जागीरदारों सहित अंग्रेजों के बच्चे ही शिक्षा लेने आते थे। आज यहां आमजन के बच्चे भी शिक्षा लेते हैं। १०० साल से भी पुराने इस स्कूल में शहर ही नहीं, बल्कि प्रदेश और देश को गौरवान्वित करने वाली स्मृतियां जिंदा हैं।
केसरिया बाना है पहचान
राजस्थान के इतिहास में साफे, पाग-पगडिय़ों का विशेष महत्व रहा है। मंगल पर्व से लेकर युद्ध के मैदान तक अलग-अलग प्रकार की पगड़ी, साफे लोग अपने सिर पर धारण करते थे, इसलिए उसी परंपरा को कायम रखते हुए आज भी स्कूल में बच्चों को साफा बांधने की कला सिखाई जाती है और सोमवार के दिन वीरता के प्रतीक केसरिया बाना विद्यार्थियों की गणवेश में शामिल है।
सबसे अधिक पदक विजेता यूं तो इस स्कूल ने देश और प्रदेश को अनेक क्षेत्रों में प्रतिभाएं दी, लेकिन देश की तरफ से प्राण न्योछावर करने वाले रणबांकुरे भी प्रदेश में सबसे ज्यादा इसी स्कूल से निकले हैं। इनमें परमवीर चक्र विजेता मेजर शैतान सिंह, शौर्य चक्र विजेताओं में मेजर मलसिंह, एवीएम चंदन सिंह, नायब सूबेदार लालसिंह खींची, फ्लाइट लेफ्टिनेंट जगमाल सिंह सहित वीर चक्र विजेता रावत सिंह के अलावा कई प्रमुख नाम हैं। इनके अलावा रियासतों के समय वीरता का अदम्य परिचय देने वालों में विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित गोविंद सिंह जैसे रणबांकुरे भी है। सैन्य सेवाओं और बीएसएफ की बात करें तो करीब 71 अधिकारी यहां से देश सेवा में गए।
Published on:
16 Aug 2017 02:41 pm
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