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वीरान मरघट को बना डाला मधुबन, पेड़-पौधों की बच्चों जैसी देखभाल…

महादेव वाटिका और पिलार बालाजी वाटिका में लहलहा रहे 3000 पौधे

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बनाड़. हर साल पर्यावरण दिवस पर पर्यावरण बचाने के लिए देश भर में रैलियां, संगोष्ठियां, चिंतन-मनन होता है, लेकिन धरातल तक पहुंचने से पहले ही पर्यावरण संरक्षण का संकल्प अगले साल पर्यावरण दिवस तक के लिए टाल दिया जाता है। समाज में कुछ एेसे लोग भी हैं जिन्होंने अपना जीवन ही पर्यावरण की सुरक्षा व संरक्षण के लिए समर्पित किया है। इन्होंने न केवल पर्यावरण को जीवन का हिस्सा बना लिया है, बल्कि पेड़-पौधों से यारी भी शिद्दत के साथ बखूबी निभा रहे हैं।

बनाड़ क्षेत्र के खोखरिया गांव के उप सरपंच सुखाराम कालीराणा और उनके साथी मंगलाराम फंगाल वर्ष 2008 से अपना पूरा समय पौधे लगाने व उनकी देखभाल के लिए समर्पित किया है। पौधे लगाने और उनकी रखवाली उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके है। सुखाराम कालीराणा पिछले 8 साल में अब तक पौधे लगाने व उनके संरक्षण के लिए अपनी जमा पूंजी के करीब 7 लाख खर्च कर चुके हैं।

लोगों को धूप में खड़े देख उठाया कदम

सुखाराम कालीराणा ने बताया कि एक दशक पूर्व 2008 में जब उनके पिताजी का देहांत हुआ तब वे खोखरिया गांव के श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार के दौरान अंतिम संस्कार में शामिल लोगों को धूप में खड़े देखा। इनमें बुजुर्ग भी थे, जो ज्यादा परेशान होकर छाया की तलाश में घूमते नजर आए। लेकिन वहां कोई पेड़ ही नहीं था। वो नजारा दिलों दिमाग में रहा और उसी वक्त ठान लिया कि अगली बार किसी को भी इस तरह की परेशानी नहीं उठानी पड़े। कुछ दिन बाद अकेले ही श्मशान घाट को हरा-भरा बनाने में जुट गए। सबसे पहले तो श्मशान घाट परिसर की कंटीली झाडि़यों और घास को साफ करवाया और मात्र 20 पौधों के साथ अपने मिशन हरयालो की शुरुआत की। उसके बाद आठ साल में करीब ३ हजार पौधे लगा दिए। श्मशान घाट ही नहीं, बनाड़ पिलार बालाजी मंदिर परिसर व उसके आसपास की बाहर दीवार के साथ-साथ श्मशान घाट के पास बनी महादेव वाटिका को भी हरा भरा बना दिया।

एक किलोमीटर दूर से लाते है पानी

श्मशान घाट में पेड़-पौधों के नियमित रखरखाव के लिए पानी की कोई सुविधा नहीं है। कालीराणा ने बताया कि पौधों को पानी देने के लिए करीब एक- डेढ़ किलोमीटर की दूर से पानी लाकर इन पौधों को संरक्षित कर रहे है। पिलार के बालाजी मंदिर परिसर में बने कुएं से श्मशान घाट तक पानी लाने के लिए छोटी पाइप लाइन बिछाई। इसके लिए उन्होंने किसी से आर्थिक मदद नहीं लेकर खुद ही पाइप व पानी की मोटर खरीदी। उसके बाद पाइप लाइन बिछाने के लिए मजदूरों के साथ खुद भी लगे रहे। इसी दौरान उनके साथी मंगलाराम फंगाल भी पर्यावरण संरक्षण कार्य में उनके साथ जुट गए। तब से लेकर अभी तक वह उनके साथ लगे हुए है। मौजूदा समय में तीन जगहों पर करीब तीन हजार पौधे लहलहा रहे है।

हर माह हजारों का खर्च


इन पेड़-पौधों के संरक्षण के लिए हर माह हजारों रुपए खर्च हो रहे है। पौधों में दीमक नहीं लगे, इसके लिए दवा का छिड़काव हर माह करना होता है। सरकार की ओर से अब तक उन्हें खाद और दवा तक नहीं मिला है। कालीराणा ने बताया कि अब कुएं में भी पानी खत्म होने के कगार पर है। एेसे में वह कई बार जलदाय विभाग से मांग कर चुके है कि श्मशान घाट तक पानी की लाइन बिछाई जाए। लेकिन इस आेर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। कई बार जब पानी नहीं आता है तो खोखरिया निवासी घेवरराम नि:शुल्क पानी के टैंकर डालते है। वहीं पौधों को जानवरों से बचाने के लिए लोहे की जाली लगाने के साथ ही तारबंदी की गई है।

काजरी व आफरी वैज्ञानिकों का भी सहयोग

श्मशान घाट सहित तीनों जगहों पर शीशम, खारी बादाम, अनार, चंदन, कनेर, पीपल, खजूर, शहतूत, नीम सहित सैकड़ों किस्म के पौधे लगा रखे हैं। इन पौधों की रखवाली के लिए अधिकांश समय वहीं पर रहते है। पौधे लगाने से पहले काजरी व आफरी में मिट्टी की जांच भी करवाई। वैज्ञानिकों की सलाह के बाद वे यहां पर जल्द तैयार होने वाले पौधे लगा रहे है। वह पौधे के रख-रखाव के लिए बीच-बीच में आफरी व काजरी प्रशिक्षण के लिए भी जाते है।


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