
एक रात शहर में होता महिलाओं का राज... डंडा लेकर निकलती हैं सड़कों पर
ऐसी भी लोक मान्यता है कि यदि कुंआरे युवक को तीजणियों की बैंत पड़ जाए तो उसका विवाह जल्द ही हो जाता है। वे पूरे रास्ते गीत गाती हुई और बेंत लेकर उसे फटकारती हुई चलती। बताया जाता है कि महिलाएं डंडा फटकारती थी ताकि पुरुष सावधान हो जाए और गवर के दर्शन करने की बजाय किसी गली, घर या चबूतरी की ओट ले लेते थे। कालांतर में यह मान्यता स्थापित हुई कि जिस युवा पर बेंत डंडा की मार पड़ती उसका जल्दी ही विवाह हो जाता।
नारी शक्ति को रेखांकित करने वाले धींगा गवर मेले की तैयारियां पूरी हो चुकी है। विदाई महोत्सव में रतजगे की रात स्वांग रचकर गवर दर्शनार्थ पहुंचने वाली तीजणियों के स्वागत एवं पारम्परिक सांस्कृतिक कार्यक्रम, अनुष्ठान गीत- नृत्य की इन्द्रधनुषी छटा में राजस्थान पत्रिका भी भागीदारी निभाएगा। सिटी पुलिस स्थित चाचा गली में तीजणियों के दर्शनार्थ सोलह शृंगार से सजी-धजी छह फीट विशाल धींगा गवर की प्रतिमा विराजित की जाएगी।
बेंतमार गणगौर मेला कमेटी के अध्यक्ष अनिल गोयल ने बताया कि राजस्थान पत्रिका एवं गांधी परफ्यूमरी के भगवान गांधी व अनिरूद्ध गांधी के सहयोग से मंगलवार की रात मनाए जाने वाले जोधपुर के अनूठे बेंतमार धींगा गवर मेले में आकर्षक स्वांग रचने वाली तीजणियों को सम्मानित किया जाएगा। सर्वश्रेष्ठ परम्परागत गवर लोकगीत प्रस्तुत करने वाले तीजणियों के समूह को राजस्थान पत्रिका, बेंतमार गणगौर मेला कमेटी और गांधी परफ्यूमरी के भगवान गांधी व अनिरूद्ध गांधी की ओर से स्मृतिचिह्न एवं प्रमाणपत्र प्रदान कर सम्मानित किया जाएगा।
गवर प्रतिमा शृंगार के लिए कोलकाता से विशेष ड्रेस मंगाई गई है। मेला स्थल पर सांस्कृतिक संध्या के दौरान अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार कालूनाथ व सहयोगी महिला कलाकारों का नृत्य विशेष आकर्षण का केन्द्र होगा। कोविडकाल के दो साल बाद हो रहे धींगा गवर मेले के लिए तीजणियों में इस बार पौराणिक , ऐतिहासिक, सामाजिक और समसामयिक विषयों पर स्वांग रचने के प्रति उत्साह है। पूजन महोत्सव के समापन समारोह की रात्रि होने वाले बेंतमार गणगौर मेले लेकर तीजणियों के अलावा शहरवासियों में भी खासा उत्साह है। परकोटे के भीतरी शहर व उपनगरीय क्षेत्रों में रविवार को जगह-जगह गवर पूजन स्थलों पर पारम्परिक गीत गूंजते रहे।
कौन थी धींगा
धींगा गवर को खासतौर पर मारवाड़ अंचल में ही पूजा जाता है। इतिहास में दर्ज है कि ईसर गवर शिव पार्वती के प्रतीक हैं तो वहीं धींगा को ईसर की दूसरी पत्नी के रूप में जाना जाता है। मान्यता है कि धींगा गवर नाम की एक भीलणी थी, जो बहुत जल्द विधवा हो गई थीं। इसके बाद वो ईसर के नाते आ गई थी। क्योंकि धींगा गवर के पति का निधन हो गया था और उसे बाद में ईसर जैसे पति मिले, इसीलिए विधवा औरतें भी इस त्योहार पर पूजन करती हैं।
तीजणियों ने कहा.......
-मैं 40 साल से पूजन कर रही हूं। सोलह दिवसीय गवर पूजन में तीजणियां कच्चे सूत के सोलह धागों को सोलह गांठ लगाकर पूजन करती हैं। यह धागा 16 संस्कार , सोलह शृंगार , सोलह वर्ष तक लगातार पूजन का प्रतीक भी माना जाता है
-मधुबाला पुरोहित
-दस साल से गवर माता की पूजा कर रही हूं और इस बार पौराणिक स्वांग, गवर-ईसर की तैयारी है। बेंतमार मेले में लगता है कि एक दिन शहर की गलियों में हम महिलाओं का राज है ।
-सीमा हर्ष
कोविडकाल के दो साल बाद आयोजन को लेकर मंडली की तीजणियों में उत्साह है। अधिकांश तीजणियां इस बार धार्मिक स्वांग रचने के प्रति उत्साहित हैं। गवर माता से प्रार्थना की जाएगी कि कोविडकाल जैसा नजारा फिर से कभी भी ना हो।
-अनुराधा जोशी
मैं 35 साल से गवर पूजन कर रही हूं। सौभाग्य के लिए सोलह दिवसीय गवर माता की आराधना के दौरान गवर पूजने वाली महिलाएं पितृकुल एवं ननिहाल से जुड़े सभी सदस्यों के लिए मंगलकामना व गीत गाती हैं । ऐसा आयोजन सिर्फ यहीं होता है।
- विमला व्यास
-आमतौर पर सुहागिनों के लिए माने जाने वाले गवर पूजन की शृंखला में धींगा गवर ही ऐसा पर्व है, जिसमें विधवा महिलाओं को भी गवर पूजन का अधिकार दिया गया है।
-कमला पुरोहित
नारी शक्ति को रेखांकित करने वाले धींगा गवर मेले में तीजणियों की सुरक्षा के समूचित इंतजाम होने चाहिए। इस बार गवर विदाई की वेळा पर कुछ लीक से हटकर स्वांग रचने का सोचा है।
-आशा पुरोहित
Published on:
18 Apr 2022 04:54 pm
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