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जोधपुर के वैज्ञानिक रलिया की यह तकनीक देश की कृषि नीति में होगी शामिल, सरकार ने अमरीका से बुलाया

अमरीका में नैनो टेक्नोलॉजिस्ट डॉ. रमेश दिल्ली में १३ को देंगे प्रस्तुतीकरण  

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बासनी/जोधपुर. किसानों के लिए आधुनिक नैनो खाद की उपलब्धता की दिशा में खाद एवं रसायन मंत्रालय की एक कदम आगे बढ़ा रहा है। इससे किसानों को नैनो पार्टिकल्स के रूप में खाद मिलेगी। इससे पौधों की उत्पादन शक्ति बढ़ेगी। इस आधुनिक नैना ेफर्टिलाइजर को अपने शोध के जरिए बनाने वाले वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी, अमरीका में नैनो टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिक डॉ. रलिया भारत सरकार को प्रस्तुतीकरण देंगे। डॉ. रलिया जोधपुर के खारिया खंगार निवासी हैं। डॉ. रलिया १३ को भारत सरकार के नीति निर्धारकों और विशेषज्ञ वैज्ञानिक समूह को अपना शोध बताएंगे। इसके बाद नीति आयोग के कुछ प्रतिनिधियों और उद्योगपतियों से इस तकनीक को वृहद स्तर पर बनाने के बारे में चर्चा करेंगे।

गौरतलब है कि किसान परिवेश से ताल्लुक रखने वाले डॉ. रलिया जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी जोधपुर के छात्र रहे हैं। उन्होंने नैनो टेक्नॉलजी में शोध करते हुए खेती के लिए आधुनिक नैनो फर्टिलाइजर बनाया है। इससे पौधों की उत्पादन शक्ति और पोषक तत्वों में बढ़ोतरी होती है। इसी शोध के लिए अमरीका में भी इंट्रप्रन्योर लीडरशिप, लीप अवॉर्ड, ग्लोबल इम्पैक्ट अवॉर्ड फायनलिस्ट, ब्रिटिश में ग्लोबल बायो टेक्नॉलॉजी अवॉर्ड और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम गोल्ड मैडल भी मिला है।

शोध के बाद किया ५ साल परीक्षण

डॉ. रलिया ने अपनी नैनो खाद पर किए शोध को पिछले पांच वर्ष के लगातार परीक्षण के बाद भारत के किसानों को इसका फायदा दिलाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। इस पर खाद एवं रसायन मंत्रालय की ओर से प्रस्तुतीकरण का आग्रह किया। इसके पहले डॉ. रमेश ने किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और केंद्रीय किसान कल्याण राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, कानून राज्यमंत्री पीपी चौधरी, राज्यसभा सांसद रामनारायण डूडी, पूर्व सांसद बद्रीराम जाखड़, जेडीए अध्यक्ष प्रो. महेंद्र सिंह राठौड़, भारतीय जनता पार्टी के महासचिव राममाधव और विधायक हनुमान बेनीवाल से भी व्यक्तिगत मुलाकात कर राज्य और केंद्र स्तर पर इस तकनीक को लागू करवाने के प्रयास किए।

क्या है नैनो खाद

नैनो पार्टिकल्स ऐसे छोटे कण होते हैं, जिनका आकार एक से 100 नैनोमीटर के मध्य होता है। एक नैनोमीटर एक मीटर का एक अरबवां हिस्सा होता है। बहुत छोटा आकार होने के कारण पौधे की कोशिकाएं जल्दी से इन पार्टिकल्स का उपयोग कर लेती हैं, जबकि साधारण खाद का आकार बड़ा होने और जमीन में पाए जाने वाले अन्य कारकों के कारण पौधा में प्रयोग की गई खाद का 50 प्रतिशत से कम ही उपयोग हो पाता है। डॉ. रलिया ने बताया कि दुनिया में उपयोग में आ रहे फॉस्फोरस का 45 फीसदी भारत और चीन मिलकर करते हैं। वर्तमान दर से फॉस्फोरेस का उपयोग होता रहा तो आने वाले 8 से 10 दशकों में फॉस्फोरेस की उपलब्धता खत्म हो जाएगी।

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