
सवा लाख लोगों को किया नशे से दूर, यूं कर सकते है नशेडिय़ों की पहचान
- 70 प्रतिशत युवा वर्ग हो रहा नशे का आदि
मंडोर. मानव कल्याण के लिए राष्ट्रीय सेवा में संलग्न समग्र नशा मुक्ति पुनर्वास केन्द्र माणकलाव में चार दशक के दौरान करीब सवा लाख लोगों को नया जीवन मिला है। शहर से 22 किमी दूर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार एवं अफीम मुक्ति चिकित्सा प्रशिक्षण अनुसंधान ट्रस्ट के सहयोग से संचालित केन्द्र चार दशक पूर्व वर्ष 1978 में नशा मुक्ति शिविर के रूप में शुरू हुआ था। बिहार की मगध यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे पूर्व राज्यसभा सदस्य डॉ. नारायणसिंह माणकलाव ने विशेष बातचीत में बताया कि तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. नीलम संजीव रेड्डी अन्त्योदय योजना का उद्घाटन करने माणकलाव पहुंचे थे। समारोह में 25 अन्त्योदय परिवार को चेक प्रदान किए गए थे। उस समय माणकलाव सरपंच वे थे। कुछ दिन बाद दिल्ली से अंत्योदय योजना की प्रगति रिपोर्ट के लिए आई टीम को वे लाभांवित जोराराम के घर लेकर पहुंचे। पता चला कि अन्त्योदय योजना में जो 25 भेड़ें दी गई थी, जोराराम उन्हें बेचकर अफीम खा चुका है। अन्य 25 लाभान्वितों में से 17 लोग इसी तरह अफीम का सेवन कर चुके थे। उन्होंने उसी समय सभी को अफीम छुड़ाने का संकल्प लिया और शिविर की तैयारी की। पहला शिविर नवंबर 1978 में लगा कर 17 लोगों की अफीम छुड़ाई गई। बाद में लगातार शिविर आयोजित होते रहे।
25 देशों की यात्रा की
डॉ. सिंह ने नशेडिय़ों की हालत और उनके पुनर्वास की जानकारी के लिए करीब 25 देशों का भ्रमण किया। अधिकांश देशों में उन्हें नशे से पीडि़त लोगों के हिंसात्मक व्यवहार के कारण उन्हें मिलने नहीं दिया गया।
हर साल 27 लाख का अनुदान
माणकलाव में संचालित समग्र नशा मुक्ति पुनर्वास केन्द्र के संचालन पर हर साल करीब 30 लाख का खर्च आता है। भारत सरकार की ओर से पूरे साल के लिए 27.62 लाख का अनुदान मिलता है। शेष राशि ट्रस्ट की ओर से वहन की जाती है। इसमें चिकित्सक सहित 16 सदस्यीय स्टाफ का वेतन 18 लाख 49 हजार 200, मेडिकल पर 2 लाख 16 हजार, परिवहन पर 72 हजार, भोजन व अन्य पर 8 लाख 10 हजार, भवन रखरखाव पर 21 हजार वार्षिक खर्च होता है। माणकलाव आए तो आया जीवन में बदलाव हिण्डौन से आए पहुंचे विजय और हनवंत ने बताया कि वे करीब दो साल से स्मैक पी रहे थे। जयपुर में कुछ गलत दोस्तों की संगत में स्मैक पीने की आदत पड़ी। इससे परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी थी। माणकलाव केन्द्र के बारे में पता चला तो यहां आए। सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी के पुत्र नीरज ने बताया कि उनकी खुशहाल पारिवारिक जिंदगी में नशे की लत ने जहर घोल दिया। हालात यह हो चुके थे रात के समय लाश की तरह पड़े रहना पड़ता था। पत्नी परेशान हो चुकी थी। अब नशे की लत से पूरी तरह छुटकारा पाना चाहता हूं। भरतपुर के सियाराम की पत्नी हेमा ने किसी ने धोखे से यह लत पति को लगा दी। हमारे तीन बच्चों सहित हंसते-खेलते परिवार की खुशियां नशे के कारण काफूर हो गई।
नशीली दवाइयों को सेवक करने वालों के लक्षण व पहचान:
1. बात कहकर भूल जाना, गुमराह करना, झूठ बोलना।
2. बिना बात गुस्सा, चिड़चिड़ाहट व बेवजह तर्क-वितर्क।
3. यह नहीं मानना कि नशे की आदत है।
4. उल्टियां होना, खांसी का दौरा पडऩा व शरीर में दर्द होना।
5. आंखों में लाली और सूजन, सुस्ती व नींद में रहना।
6. बाहों, कपड़ों व उंगलियों पर जले या सुई के निशान होना।
7. लडखड़़ाकर चलना-बोलना।
8. शरीर से दुर्गन्ध आना।
9. स्वास्थ्य में गिरावट, भूख न लगना।
10. किसी काम जी नहीं लगना।
नशे की लत वालों की सहायता
1. नशा बीमारी है। अधिकांशत: वे व्यक्ति इसकी चपेट में आते है जो सामाजिक, मानसिक व आर्थिक रूप से अस्वस्थ होते है। पुलिस को उनके साथ सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिए।
2. नशेड़ी को धैर्य बंधाएं व मनोबल ऊंचा करें।
3. इलाज के लिए प्रोत्साहित करें।
4. किसी डी-एडिक्शन क्लीनिक, काउंसलिंग सेंटर या अस्पताल ले जाएं और परिवार वालों को भी उसका इलाज करवाने की सलाह दें।
Published on:
04 Jun 2018 01:10 pm
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