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नंदकिशोर सारस्वत/जोधपुर. माचिया जैविक उद्यान में करीब 15 दिन पहले पिंजरे की जालियों को तोड़कर भागा लकड़बग्घा रविवार को पुन: खुद ही पिंजरे में कैद हो गया।। लकड़बग्घा कई दिनों से भूखा प्यासा था। उसे पकडऩे के लिए वन विभाग ने माचिया जैविक उद्यान परिसर में ही मांस के साथ में एक पिंजरा लगा रखा था। ताकि आहार के लालच में वह पिंजरे में आए और उसे सुरक्षित पकड़ा जा सके। माचिया जैविक उद्यान के वन्य जीव चिकित्सक डॉक्टर श्रवण सिंह ने बताया कि कई दिनों से भूखा-प्यासा लकड़बग्घा आज पिंजरे में कैद होने के बाद उसे 2 किलो मांसाहार दिया गया। उसकी स्थिति बहुत कमजोर हो गई है। उस पर विशेष नजर रखी जा रही है।
दरअसल लकड़बग्घा कई दिनों से वन कर्मियों के साथ में आंख-मिचौली खेल रहा था। उसकी तलाश में जुटे वन कर्मियों को कई बार नजर आया लेकिन ट्रेंकुलाइज गन शॉट दो बार विफल होने के बाद में रणनीति में परिवर्तन कर खाली पिंजरे में मांसाहार रखा गया। ताकि भूख से व्याकुल लकड़बग्घा पिंजरे में पहुंचे। इसके लिए एक मादा लकड़बग्घा भी पास में रखी गई। करीब 15 दिन बाद वह खुद ही पिंजरे में आया और जैसे मांस का लोथड़ा खींचा और कैद हो गया।
उल्लेखनीय है कि मादा लकड़बग्घे को उसी दिन पास की झाडिय़ों में दबोच लिया गया गया था। लेकिन नर लकड़बग्घा माचिया जैविक उद्यान परिसर की झाडिय़ों में जा छिपा था। 30 सदस्यीय दल माचिया की पहाडिय़ों व झाडिय़ों की खाक छानता रहा था। माचिया में फिलहाल छह लायन और चार पैंथर, भालू, भेडि़ए, लोमड़ी, मगरमच्छ आदि हमलावर वन्यजीवों सहित विभिन्न प्रजातियों के 500 से अधिक वन्यजीव मौजूद हैं। वर्ष 2016 में माचिया जैविक उद्यान का निर्माण राजस्थान स्टेट रोड डवलपमेंट कॉर्पोरेशन ने किया था। माचिया के निर्माण के समय एन्क्लोजर्स के बारे में अंतरराष्ट्रीय स्तर के होने का दावा किया गया था। लेकिन दो लकड़बग्घों ने अपने दांतों से काट कर इसकी पोल खोल दी।
Published on:
01 Apr 2018 12:58 pm
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