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350 सालों से लोक देवता बाबा रामदेव ब्यावला गायन की निभा रहे है परंपरा

पूरे साल में सिर्फ दो बार मारु राग में होता है 700 दोहों का ब्यावला प्रस्तुत

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350 सालों से लोक देवता बाबा रामदेव ब्यावला गायन की निभा रहे है परंपरा

350 सालों से लोक देवता बाबा रामदेव ब्यावला गायन की निभा रहे है परंपरा

नंदकिशोर सारस्वत

जोधपुर. जोधपुर जिले के पंडितजी की ढाणी में हर साल माघ शुक्ल पक्ष एकादशी और भाद्रपद माह शुक्ल पक्ष की एकादशी को लोकदेवता बाबा रामदेव के ब्यावले गायन की अनूठी परम्परा का निर्वहन पिछले 350 साल से अनवरत किया जा रहा है। बाबा रामदेव के अनन्य भक्त हरजी भाटी कृत हस्तलिखित रामदेव ब्यावले में कुल 700 दोहे लिपिबद्ध है जिसकी मूल प्रति हरजी भाटी निर्मित क्षेत्र के रामदेव मंदिर के वर्तमान गादीपति रूपदास महाराज के पास सुरक्षित मौजूद है।
पांच भागों में विभक्त ब्यावले का पूरी रात होता है गायन
बाबा रामदेव भक्ति परम्परा के पीठाचार्य पं. मोहनलाल गर्ग के अनुसार करीब 350 वर्ष पूर्व विक्रम संवत 1717 ईसवी सन 1660 में ओसियां से पूर्व बेटवासिया में बाबा रामदेव के परमभक्त हरजी भाटी को बाबा रामदेव ब्यावला की रचना करने का दृष्टांत स्वयं बाबा रामदेव ने दिया। हरजी भाटी ने 700 दोहों में बाबा रामदेव की जीवनी पर आधारित दिव्य ब्यावले की रचना की थी। पांच भागों में विभक्त ब्यावले में रामदेव वंशज जीवनी, मंगल अरदास, जन्मपत्री, मूल ब्यावला और बधावणा का विस्तार से उल्लेख है। हरजी भाटी ने उनके दो शिष्य विजोजी व करणीराम (सूरदासजी ) के साथ प्रथम बार ब्यावले का गायन भाद्रपद व माघ शुक्ल पक्ष की ग्यारस को गायन किया था। उसके बाद विगत 350 साल से उसी तिथि को यह परम्परा हर साल निभाई जा रही है। क्षेत्र में ऐसी लोक मान्यता है कि बाबा के ब्यावला के श्रवण से भक्तों के जीवन में बदलाव और उनकी मनोकामना पूर्ण होती है।

सभी गायकों को पूरा ब्यावला कंठस्थ, केवल लोकवाद्यों का प्रयोग
बाबा रामदेव ब्यावला गायन में विजोजी वंशज के परिवार की ओर से कपड़े का घोड़ा बनाकर शृंगार आदि कर पाट पर विराजित कर उनके समक्ष रात्रि भर अखंड ज्योत कर महाब्यावला हरजी भाटी की तरह राग मारू में गाया जाता है । ब्यावला गायन के समय हरजी भाटी वंशज और वर्तमान गादीपति रूपदास ज्योत के समक्ष बैठते है। गायन के दौरान लोकवाद्य बादल वीणा, तम्बूरा, ढोलक, हारमोनियम, मंजीरा व खड़ताल का प्रयोग होता है। विजोजी वंशज पीढ़ी के नवलदास, डूंगरदास, माणकदास, शेरदास व वीरदास को पूरा गायन कंठस्थ है। सर्वाधिकार सुरक्षित होने के कारण पूरे देश में केवल विजोजी वंशज ही यह गायन की परम्परा निभा रहे है। कार्यक्रम के दौरान किसी भी तरह रिर्काडिंग अथवा फिल्मांकन पर भी प्रतिबंध है।