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Gangaur Puja : अबोध है फिर भी कर रही 18 दिन की यह कठिन साधना

राजस्थान में गौरी पूजन का रिवाज है, जिसे गणगौर पूजन तक नियमित रूप से किया जाता है और इसके करने के लिए ना केवल आस्था की बल्कि कईं नियमों की पालना भी करनी होती है। इसे करना काफी मुश्किल होता है, लेकिन बावजूद इसके बेटियां अपने भाई व परिवार की खुशहाली के लिए गोरी पूजन की परम्परा का सैकड़ों सालों से निर्वहन करती है।

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Gangaur Puja : अबोध है फिर भी कर रही 18 दिन की यह कठिन साधना

फलोदी. गौरी(गवरा) पूजन करती बालिकाएं। पत्रिका

- गौरी पूजन की परम्परा का निर्वहन कर बच्चियां करा रही अपनी जिम्मेदारियों का बोध
- होली की धुलंडी के साथ शुरू हुआ गौरी-ईशर पूजन का सिलसिला
- फलोदी में सूरज को भाई मानकर कन्याओं ने परम्परागत रुप से मनाया सूरज रोटा का पर्व

फलोदी (जोधपुर) . बेटी अबोध है, फिर भी उसे अपने परिवार की चिंता है और खेलने और पढने की उम्र में ना केवल रोजमर्रा के काम में अब भी बेटियां ही आगे है, बल्कि छोटी सी उम्र में 18 दिन की कठिन साधना से भी पीछे नहीं है।


जी हां होली व परम्परागत गेर के बाद राजस्थान में गौरी पूजन का रिवाज है, जिसे गणगौर पूजन तक नियमित रूप से किया जाता है और इसके करने के लिए ना केवल आस्था की बल्कि कईं नियमों की पालना भी करनी होती है। इसे करना काफी मुश्किल होता है, लेकिन बावजूद इसके बेटियां अपने भाई व परिवार की खुशहाली के लिए गोरी पूजन की परम्परा का सैकड़ों सालों से निर्वहन करती है।

होली के बाद अब गौरी (गवर) पूजन का सिलसिला शुरू हुआ है। जो गणगौर तक चलता है। सुबह गौरी पूजन व शीतला सप्तमी के बाद अपने भाई की दीर्घायु के लिए घुड़ले सिर पर धारण कर घूमने की परम्परा बच्चियों की कठिन साधना का महत्पूर्ण हिस्सा है। जिसे पाश्चत्य संस्कृति ने कम जरूर किया है, लेकिन छोटे शहरों व गांवों में आज भी यह संस्कृति जीवंत है।


जिम्मेदारी का अहसास
जानकारों की माने तो बाल्यवस्था होने के बाद भी अबौध अवस्था में भी गौरी पूजन की परम्परा निभाने की तभी तो पांच साल से 12 साल की आयु तक वह अपने भाई व बाल्यकाल में ही बच्चियों में जिम्मेदारी का बौध करवाने के लिए राजस्थान में कईं परम्पराएं है, जिसमें गौरी पूजन भी एक है। होली दहन व परम्परागत गेर के बाद कन्याओं के लिए सैकड़ों साल पहले शुरू की गई गौरी (गवरा) पूजन की यह परम्परा वर्तमान के आधुनिक समय में भी जारी है।

12 साल तक की कन्याओं की ओर से गौरी पूजन किया जाता है। इस परम्परा का उद्धेश्य ना केवल धार्मिक तौर पर भी खास है, बल्कि घर परिवार व धर्म के प्रति सजगता का भी सन्देश है। हालांकि वर्तमान समय में इस परम्परा का निर्वहन कम देखने को मिलता है, लेकिन फिर भी अभी भी कईं परिवारों में गौरी पूजन की परम्परा कायम है। इसे अंग्रेजी माध्यम में पढने वाली कन्याएं धार्मिक व वैदिक रीति से करती नजर आती है।

सूरज को भाई मान किया पूजन
होली के बाद पहरे रविवार को बालिकाओं ने अदीत रोटे के व्रत रखा और कम उम्र होने के बावजूद भी परिवार व भाई के कष्टों के निवारण के लिए यह व्रत धारण कर पूरे दिन में एक समय ही भोजन प्राप्त कर गौरी (पार्वती) की आराधना की।