
तुमको देखा तो ये खयाल आया.. जिदंगी धूप तुम घना साया...
नंदकिशोर सारस्वत
जोधपुर. कुछ वर्षों पहले पश्चिमी संगीत से बौखलाई हमारी पीढ़ी जब सुकून की तलाश में निकली तो रास्ते में गज़़ल से उसका पाला पड़ा। बेगम अख्तर, मेहंदी हसन, गुलाम अली, इकबाल बानो, फऱीदा ख़ानम के अलावा और भी गजल गायकी के नक्षत्र जगमगाते सितारों ने गजल गायकी को नया आसमान दे डाला और इस जगमगाहट में बिजली की तरह कौंध गया एक नाम अमर गायक जगजीत सिंह। एक साथ निष्णात गायक संगीत की तहजीब को अपने में समेटे संगीत के नए आयामों को छुआ। अनगिनत नायाब धुनों को अपनी कंठ अभिव्यक्ति से जन-जन तक पहुंचाया। जो स्वर उनके गले से निकले इस जमाने भर की अमूल्य निधि बन गया। राजस्थान के गंगानगर में 8 फ रवरी 1941 को जन्मे अमर गायक जगजीतसिंह का जोधपुर से भी नाता रहा है। आज नौवीं पुण्यतिथि पर जोधपुर में हुए उनके कार्यक्रम से जुड़े रहे लोगों व प्रशसंकों से पत्रिका की विशेष बातचीत।
मुलाकात बन गई एक अनुभूति
मुझे तीन बार उनसे मिलने सुनने और गुफ्तगू करने का मौका मिला । पहली बार चित्राजी के साथ 1983 में जोधपुर के ओलंपिक सिनेमा में उनका प्रोग्राम और फिर दो बार उम्मेद भवन के बारादरी में हुए कार्यक्रम संचालन का अवसर मुझे मिला था। प्रोग्राम के अगले दिन लंच के दौरान उन्होंने मुझसे कहा मौहतरमा आपकी आवाज बहुत प्यारी मीठी है । अंदाज लाजवाब और आपने जोधपुर की संगीत संस्कृति के बारे में जो कहा वह अद्भुत, उम्दा और लाजवाब था । बस मेरे लिए वह मुलाकात एक अनुभूति बन गई।
-अनुराधा आडवाणी, कला मर्मज्ञ व रंगमंच कलाकार
तब पूरे जोधपुर का किया था भ्रमण
जोधपुर के प्रोग्राम के सिलसिले में जगजीत सिंह से पहली मुलाकात 1983 मुंबई में उनके घर पर मेरे मित्र कमलेश के साथ हुई। हमने उनसे समय मांगा तो उन्होंने हमें घर पर चाय पर बुलाया और बोले आप जोधपुर राजस्थान मेरे ही घर से आए हो । उस वक्त राजस्थान के कल्चर के बारे में विस्तार से बातचीत हुई। जगजीत सिंह का पहला कार्यक्रम जोधपुर में स्वर सुधा की ओर से 18 दिसंबर 1983 को ओलंपिक सिनेमा में किया गया था। तब उनके साथ पहली बार चित्रा सिंह व पुत्र विवेक सिंह भी जोधपुर आए थे। उन्हें जोधपुरी भोजन व मांड गायकी बहुत ज्यादा पसंद थी । जोधपुर आए तब उन्होंने बॉम्बे मोटर स्थित मेरे घर पर भोजन किया। जगजीतसिंह का दूसरा प्रोग्राम 14 सितंबर 1996 को उम्मेद भवन पैलेस में हुआ तब वह अकेले ही आए थे। उस समय जोधपुर में 2 दिन तक रूक कर जोधपुर का पूरा भ्रमण किया था। उनके दोनों प्रोग्राम जोधपुर के लिए यादगार बन गए। वे जितने गायकी में निपुण थे उनसे कहीं ज्यादा उनमें सादगी थी।
-श्यामसुंदर व्यास संस्थापक सदस्य व पूर्व उपाध्यक्ष स्वर सुधा जोधपुर
जगजीत को मैंने अपने अन्दर जिया है
मैं बचपन से ही भजन के साथ साथ जगजीत सिंह की गजलों को गाता रहा हूं। मेरी उनसे मुलाकात जोधपुर में हुई थी। मैंने जब उन्हें बताया की बचपन से आपका फैन हूं तथा आपकी गजलों को गाता हूं तो बहुत खुश हुए और मुझे ब्लेसिंग दी। जिस सरलता से वो मुझसे मिले उससे मैं अभीभूत हो गया। उसके बाद 8 फ रवरी 2018 को जगजीत सिंह के 77 वें जन्मदिवस पर उनकी जन्म स्थली श्रीगंगानगर में राष्ट्रीय कला मण्डल की ओर से आयोजित कार्यक्रम हमारे जगजीत-77 कार्यक्रम में मुझे गाने के लिये आमंत्रित किया गया तो वो मेरे जीवन का सबसे सुखद अवसर था। जगजीत सिंह व उनकी गायकी हमेशा हम सभी को प्रेरित करती रहेगी। वैसे जगजीत को मैंने अपने अन्दर जिया है।
अनिल महादेव, सिंगर
जोधपुर में फिर से कार्यक्रम की हसरत ही रह गई
गजल को हिन्दी में, सरल भाषा में अगर किसी ने प्रचलित किया है तो वो है गजल सम्राट जगजीत सिंह । दो बार उनसे मिलने का अवसर मिला। अगस्त 2011 में बालसंमद में उनके कार्यक्रम के बाद मिलने के दौरान उनको जोधपुर में अगले कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया तो उन्होंने कहा शीघ्र ही वे इस पर निर्णय लेंगे। और इस बार राजस्थानी लोकगीतों को अलग ढंग से तैयार कर आएंगे। लेकिन यह हसरत दिल में ही रह गयी जब मात्र दो माह बाद ही 10 अक्टूबर 2011 को मुम्बई में उनके दुखद निधन का समाचार मिला।
-राकेश पुरोहित, अध्यक्ष- गोविन्द गंगा संस्थान
उन्हें जोधपुर आना अच्छा लगता था
-जगजीत सिंह गायकी में जितने पारंगत थे उतने ही संवेदनशील व खुशमिजाज भी थे। मेरी उनसे मुलाकात मुम्बई और जोधपुर में प्रोग्राम के दौरान हुई। प्रोग्राम के बाद वे बड़े ही गर्मजोशी से अपने चाहने वालों से मिलते थे। उन्हें जोधपुर आना अच्छा लगता था। वे कहते थे जोधपुर के सुधि श्रोताओं को किस जगह दाद देनी है अच्छी तरह पता है। उनकी गायकी , व्यवहार व बोलचाल में हिन्दी, उर्दू, पंजाबियत के साथ साथ राजस्थानी कल्चर की झलक भी देखने को मिलती थी।
रोहन्त जोशी, आलाप सांस्कृतिक संस्था
Published on:
10 Oct 2020 12:00 am
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