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अतीत के आइने में जोधपुर : महामंदिर

पार्ट-9

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अतीत के आइने में जोधपुर : महामंदिर

अतीत के आइने में जोधपुर : महामंदिर

नंदकिशोर सारस्वत
जोधपुर. जोधपुर के महाराजा मानसिंह ने अपने गुरु आयस देवनाथ के लिए 10 लाख रुपए खर्च कर सन 1805 में भव्य मंदिर बनवाया जिसे आज भी महामंदिर के नाम से जाना जाता है। उस जमाने में क्षेत्र में एक पूरा शहर बसाया गया था। महामंदिर में जो मूल मंदिर है वो जलन्धरनाथ का है। मंदिर में चौरासी स्तंभ और गर्भ गृह में 16 खंबे अर्थात कुल 100 स्तंभ है। मंदिर के गर्भगृह में 84 योगासन और नाथ योगियों के चित्र है। मंदिर का भव्य शिखर और छत पर भी कई छोटे-छोटे शिखर है। महामंदिर निर्माण 9 अप्रैल सन 1804 को आरम्भ हुआ और 4 फरवरी सन 1805 को पूर्ण हुआ । मंदिर परिसर में कई ऐतिहासिक महत्वपूर्ण शिलालेख भी है। पूरा क्षेत्र आज भी महामंदिर के नाम से ही जाना जाता है। महामन्दिर का पूरा क्षेत्र चतुर्भुज की आकृति लिए हुए है जिसके चारों कोनों पर विशाल प्रवेश द्वार (पोल) बने हैं । इसके महलों व मन्दिर के पत्थरों पर इतनी बारीकी से बेल - बूटों को उकेरा गया है कि मानो कलाकारों ने इन पत्थरों पर कसीदाकारी की है । मुख्य द्वार के ऊपरी हिस्सों व कंगूरों , झरोखों में गजब की कलाकारी स्पष्ट नजर आती है । प्रवेश द्वार पर संगमरमर के तोरण द्वार हैं जिनके स्तंभों पर आकर्षक गरुड़ों की मूर्तियां हैं । मुख्य मन्दिर का निर्माण एक बड़े चबूतरे पर किया गया है ।

मंदिर में आने वाले शरणार्थी की होती थी प्राण रक्षा
महामंदिर परिसर में कुछ महत्वपूर्ण शिलालेख भी लगे हैं । एक शिलालेख में लिखा है इस मंदिर में आने वाले व्यक्ति की प्राण रक्षा मन्दिर का कर्तव्य होता था । मन्दिर में स्थित कुआं कभी सूखा नहीं बल्कि छप्पनियां काल में यहीं से पानी शहर में जाता था । महामन्दिर का परकोटा विशाल है । प्राचीरों में दुर्ग की तरह तोप बन्दूकों के स्थान बने हैं ।