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काजरी के मोठ ने 15 साल में कमाए 15 करोड़

- दो साल पहले बाड़मेर में हुए शोध में मोठ सफल, सूखे के बावजूद 63 दिन में हुई फसल- बालू में मंूग को नहीं मिली सफलता

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काजरी के मोठ ने 15 साल में कमाए 15 करोड़

काजरी के मोठ ने 15 साल में कमाए 15 करोड़

जोधपुर. केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान की ओर से पंद्रह साल पहले विकसित मोठ की काजरी मोठ-2 वैरायटी ने 15 करोड़ रुपए कमाए हैं जो काजरी की ओर से विकसित किसी भी फसल की वैरायटी से सर्वाधिक है। किसानों और औद्योगिक संस्थानों ने इस वैरायटी के लाखों रुपए के बीज खरीदे। वर्ष 2019 में बाड़मेर के धोरीमन्ना में हुए एक नए प्रयोग के बाद मोठ-2 वैरायटी बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर व चूरू में बेहतरी उपज देने वाली फसल के तौर पर सामने आई। मूंग व मोठ दोनों ही फसलों के परीक्षण में बालू मिट्टी में मूंग को उतनी सफलता नहीं मिली। विशेष बात यह रही है कि मोठ-2 वैरायटी इक्का-दुक्का बारिश में ही 63 दिन में पककर तैयार हो गई, जबकि सामान्य मोठ 75 से 80 दिन में पकता है। साथ ही प्रति हेक्टेयर तीन हजार क्विंटल उत्पादन हुआ।
काजरी ने वर्ष 2003 में मोठ-1, मोठ-2 और मोठ-3 वैरायटी विकसित की। सर्वाधिक सफल वैरायटी मोठ-2 रही, जिसे 2005 में लॉन्च किया गया। मोठ की जडिया प्रजाति के मादा पौधे और मोठ आरएमओ-40 के नर पौधे के संकरण से नई वैरायटी निकाली गई। काजरी के कृषि विज्ञान केंद्र सहित अन्य जिलों और प्रदेश के बाहर हर साल इसके बीज की डिमाण्ड बहुत रही। पंद्रह साल में इसने 15 करोड़ रुपए का कारोबार कर लिया।

क्रॉप ज्योमेट्री की नई तकनीक विकसित
कोविड से पहले बाड़मेर के धोरीमन्ना में परीक्षण के तौर पर कम बारिश में मूंग व मोठ की वैरायटी लगाई गई। मोठ के लिए नई क्रॉप ज्योमेट्री तकनीक विकसित की गई। प्रत्येक पौधे में दस सेंटीमीटर का अंतर व दोनों लाइनों में 50-55 सेंटीमीटर का अंतर रखा गया। अतिरिक्त पौधों को बाहर निकाल लिया गया।

पानी की तलाश में 1 दिन में 1 सेमी जड़ नीचे गई
मोठ-2 वैरायटी की जड़ 45 दिन में 50 सेंटीमीटर नीचे चली गई यानी एक दिन में एक सेंटीमीटर की गति से जड़ पानी की तलाश में नीचे बढ़ी। अत्यधिक पानी देने पर जड़ रुक जाती है इसलिए एक बारिश में ही अच्छी फसल हो गई।

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‘पूरे खेत में एक साथ अधिक बीज डालने से कम्पीटिशन में पौधा मर जाता है। अधिक पानी देने से भी जड़ की वृद्धि रुक जाती है। ऐसे में नई क्रॉप ज्योमेट्री तकनीक से मोठ से पश्चिमी राजस्थान में अधिक उत्पादन लिया जा सकता है।’
-डॉ डी कुमार, पूर्व प्रधान वैज्ञानिक, काजरी जोधपुर