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Mahashivratri2022: इस मंदिर तक पहुंचना है टेढ़ी खीर, फिर भी उमड़ रहे श्रद्धालु

Mahashivratri2022 पर इस मंदिर में भले ही पहुंचने में सांस फूल जाए सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते, लेकिन लोगों की आस्था ऐसी है कि #महाशिवरात्रि पर आज इस मंदिर में तड़के से ही भीड़ उमड़ रही है। छोटी गुफा में प्राकृतिक रूप से पत्थर का बना गाय के थन की आकृति का लटकता शिवलिंग देखकर हर कोई चौंक जाता है।

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Mahashivratri2022: इस मंदिर तक पहुंचना है टेढ़ी खीर, फिर भी उमड़ रहे श्रद्धालु

Mahashivratri2022: इस मंदिर तक पहुंचना है टेढ़ी खीर, फिर भी उमड़ रहे श्रद्धालु

जोधपुर। Mahashivratri2022 पर सूर्यनगरी के नाम से विख्यात राजस्थान के दूसरे बड़े शहर Jodhpur के प्राचीन सिद्धनाथ मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। हजारों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालु शिवाभिषेक कर अपनी आस्था प्रकट कर रहे हैं।

कायलाना झील के किनारे मनोरम पहाड़ियों पर स्थित सिद्धनाथ महादेव शहर में भगवान शिव का यह सबसे ऊंचाई का मंदिर है। चौपासनी रोड स्थित फिल्टर हाउस के पास से कायलाना की ओर जा रही सड़क पर करीब दो किलोमीटर पैदल या खुद के वाहन से चलने के बाद श्रद्धालु मंदिर तक पहुंच पाते हैं। फिर भी मंदिर तक पहुंचना आसान नहीं होता। मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 355 सीढिय़ां चढऩी पड़ती है। फिर भी आस्था के ज्वार में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक मंदिर में पहुंच कर देवाधिदेव की कृपा हासिल करने की कोशिश में कमी नहीं छोड़ते। मंदिर में प्राकृतिक रूप से पास-पास बने दो शिवलिंग को शिव-पार्वती का जोड़ा मानते हुए लोग पूजा अर्चना करते हैं।

लटकते शिवलिंग की पूजा
मंदिर में स्थित छोटी गुफा में प्राकृतिक रूप से पत्थर का बना गाय के थन की आकृति वाला शिवलिंग देखकर हर कोई अचंभित रह जाता है। शिवलिंग के पास पार्वती, गणेश आदि की मूर्तियां हैं। पुराने मंदिर के अलावा परिसर में छीतर के पत्थर से सिद्धेश्वर महादेव के नाम से एक नया मंदिर भी बनाया गया है। इसके बाहर सफेद ग्रेनाइट के पत्थर की बनी नंदी की प्रतिमा स्थापित है।

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संतों की तपोस्थली हैं सिद्धनाथ की पहाडिय़ां--
19 वीं शताब्दी के प्रारंभ में आए नारायण स्वामी ने यहां तपस्या की। इसके बाद नेपाली बाबा ने अपने परिश्रम से मंदिर परिसर का जीर्णोद्धार करवाया। पहाड़ी पर आने वाला रास्ता व सीढिय़ों का निर्माण भी नेपाली बाबा की प्रेरणा से हो सका। यहां छीतर के पत्थर से नारायण स्वामी व नेपाली बाबा की समाधियों पर कलात्मक मंदिर बने हैं।

कभी हुआ करता था शिकारगाह
सिद्धनाथ की पहाडिय़ों के छीतर पत्थर से ही यहां कलात्मक मंदिरों का निर्माण किया गया है। नियमित मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं ने बताया कि पहले यह स्थान सूनसान रहता था और जंगल सी विरानी रहती थी। यहां कई जंगली जानवर विचरण करते थे। पहाड़ी के पीछे शिकारगाह थी जहां यदा कदा राजा महाराजा शिकार के लिए आते थे।

गायों की भी समाधी
मंदिर परिसर में ही गंगा, जमुना व नर्मदा नाम से तीन गायों के समाधि स्थल भी है। परिसर में पानी के संरक्षण के लिए दो बड़े हौद बने हुए हैं। इसके अलावा भी पानी के स्टोरेज के लिए छोटे तालाब बनाकर व्यवस्था की गई है।