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माउंट आबू को लेकर हाईकोर्ट ने दिए निर्देश

राजस्थान हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि पूर्ववर्ती आदेश में माउंट आबू के लिए गठित मॉनिटरिंग कमेटी की बैठक को रोकने, निर्णय लेने या उसे लागू करने से रोकने जैसा कोई विशिष्ट निर्देश नहीं था।

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माउंट आबू को लेकर हाईकोर्ट ने दिए निर्देश

माउंट आबू को लेकर हाईकोर्ट ने दिए निर्देश

जोधपुर. राजस्थान हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि पूर्ववर्ती आदेश में माउंट आबू के लिए गठित मॉनिटरिंग कमेटी की बैठक को रोकने, निर्णय लेने या उसे लागू करने से रोकने जैसा कोई विशिष्ट निर्देश नहीं था। कोर्ट के निर्देश यही थे कि ऐसी कोई भी कार्यवाही अंततः याचिका के अंतिम परिणाम से नियंत्रित होगी या ऐसे किसी आदेश से प्रभावित होगी, जो कोर्ट बाद में पारित करेगा।

मुख्य न्यायाधीश ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह और न्यायाधीश विनित कुमार माथुर की खंडपीठ में याचिकाकर्ता मंजू गुरबानी की ओर से दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान अतिरिक्त महाधिवक्ता संदीप शाह ने 24 जनवरी के अंतरिम आदेश का मामला उठाते हुए कहा कि राज्य सरकार की उपधारणा है कि मॉनिटरिंग कमेटी की बैठक आयोजित नहीं की जा सकती। इस पर खंडपीठ ने स्पष्टीकरण जारी किया।
याचिकाकर्ता ने केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की 29 सितंबर, 2021 तथा 25 जून, 2009 की अधिसूचना को चुनौती दी है। याचिका के अनुसार 2009 में केंद्र ने माउंट आबू को इको-सेंसिटिव जोन घोषित करते हुए निर्देशित किया था कि जब तक राज्य सरकार माउंट आबू का मास्टर प्लान अधिसूचित नहीं करती, तब तक माउंट आबू क्षेत्र के लिए मॉनिटरिंग कमेटी का गठन किया जाएगा, ताकि माउंट की पर्यावरण महत्ता बनी रहे एवं इस क्षेत्र में उच्च स्तरीय समिति के गठन से अवैध निर्माण गतिविधियों पर रोक लग सके। माउंट क्षेत्र में होने वाले किसी भी निर्माण कार्य की अनुमति दिए जाने का अधिकार मॉनिटरिंग कमेटी में निहित कर दिया गया था।

मॉनिटरिंग कमेटी
वर्ष 2009 की अधिसूचना के अनुसार नौ सदस्य वाली मॉनिटरिंग कमेटी का अध्यक्ष प्रबंधकीय या प्रशासनिक अनुभव वाला प्रतिष्ठित व्यक्ति होगा। वर्ष 2010 में प्रथम बार कमेटी का गठन किया गया था, जो वर्ष 2019 तक कार्यरत रही। बाद में 29 सितंबर, 2021 को केंद्र ने मॉनिटरिंग कमेटी के गठन का अधिकार राज्य सरकार को दे दिया।

प्रतिष्ठित व्यक्ति की व्याख्या
इस संशोधन में भी कमेटी के अध्यक्ष की योग्यता एवं अयोग्यता को नहीं बताया गया है। प्रतिष्ठित व्यक्ति की व्याख्या भी नहीं होने की वजह से आशंका है कि राज्य सरकार किसी अपात्र को अध्यक्ष बना सकती है। पर्यावरण मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना अस्पष्ट है एवं इसमें अध्यक्ष की योग्यता एवं अयोग्यता को भी निर्धारित नहीं किया गया है।


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