
National Flag Day Special: संशोधन प्रस्ताव वापस नहीं लेते तो तिरंगे में होता स्वस्तिक चिन्ह
National Flag Day Special: गजेंद्र सिंह दहिया/जोधपुर. देश को आजादी मिलने से पहले ही 22 जुलाई 1947 को तिरंगा भारत का राष्ट्रीय ध्वज बन गया था। तिरंगे को लेकर संविधान सभा के सभी सदस्य एकमत थे और एक ही दिन में जय हिंद के जयकारों के साथ तिरंगे के प्रस्ताव को पास किया गया। जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में झंडा प्रस्ताव रखा था, तब मध्य प्रांत (मध्यप्रदेश) के सदस्य के.वी. कामथ ने तिरंगे में अशोक चक्र के साथ स्वस्तिक चिह्न रखने का संशोधन प्रस्ताव पेश किया।
कामथ चाहते थे कि इससे भारत में सनातन व हिंदू संस्कृति की झलक देखने को मिलेगी। कामथ ने उस समय तक तिरंगे का प्रस्ताव गौर से देखा नहीं था, लेकिन जब तिरंगे को देखा तो अशोक चक्र को धर्म चक्र के रूप में देखकर उन्हें खुशी हुई और कहा कि इसमें स्वस्तिक चिह्न अच्छा नहीं लगेगा और प्रस्ताव वापस ले लिया। एक अन्य सदस्य पीएस देशमुख चरखे को तिरंगे में शामिल करने का संशोधन रखना चाह रहे थे, लेकिन सदन की मंशा देखकर उन्होंने संशोधन ही नहीं रखा। गौरतलब है कि कामथ संविधान सभा में दूसरे सर्वाधिक बोलने वाले सदस्य थे। उन्होंने 1.94 लाख शब्द बोले थे। सर्वाधिक शब्द 2.64 लाख डॉ बी.आर. अम्बेडर ने बोले।
संविधान सभा में नहीं थी झंडा समिति
संविधान सभा में जे बी कृपलानी की अध्यक्षता में किसी भी झंडा समिति का उल्लेख नहीं मिलता है। सभा अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में झंडा पर एक तदर्थ समिति जरूर बनी थी। इसी तदर्थ समिति ने तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया था।
राजस्थान से व्यास व मेहता का उद्बोधन
जुलाई को संविधान सभा में केवल एक ही काम हुआ था। इसमें पंडित नेहरू की ओर से राष्ट्रीय ध्वज पर प्रस्ताव रखा गया और इस पर लगभग 40 सदस्यों का उद्बोधन हुआ। राजस्थान से दो सदस्य उदयपुर से डॉ मोहनसिंह मेहता और जोधपुर से जय नारायण व्यास ने अपना संबोधन दिया। एक मात्र महिला सदस्य सरोजनी नायडू ने भाषण दिया।
आधा मिनट खड़े हुए
अंत में सभा के सभी सदस्यों ने आधा मिनट खड़े रहकर तिरंगे के प्रस्ताव को स्वीकार किया।
बीस साल से 365 दिन फहरा रहे हैं तिरंगा
पहले केवल 15 अगस्त अथवा 26 जनवरी को झंडा फहरा सकते थे। बाद में नवीन जिंदल बनाम भारत संघ 2002 के निर्णय के बाद यह 365 दिन 24 घंटे लगाया जा सकता है। यह भी हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भाग है ।
-डॉ. दिनेश गहलोत, असिस्टेंट प्रोफेसर व संविधान विशेषज्ञ, जेएनवीयू जोधपुर
Published on:
21 Jul 2022 04:18 pm
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