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निगहबान… अपणायत को किसी की ना लगे नजर

गणगौर पर्व से जुड़ी धार्मिक रस्में पूर्ण कर लौट रही महिलाओं के जुलूस में कुछ बाइक सवार युवक घुस गए। बताया जा रहा है कि युवक नशे की हालत में थे।

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प्रदर्शन करते लोग। फाइल फोटो- पत्रिका

संदीप पुरोहित
राजस्थान का ऐतिहासिक शहर जोधपुर अपनी अपणायत, साझा संस्कृति और गंगा-जमुनी तहजीब के लिए जाना जाता रहा है। हाल के वर्षों में बार-बार सामने आ रही घटनाएं यह संकेत दे रही हैं कि शहर का सामाजिक संतुलन कहीं न कहीं कमजोर पड़ रहा है। छोटी-छोटी बातों पर बढ़ते विवाद अब केवल स्थानीय झगड़ों तक सीमित नहीं रह जाते, बल्कि सामुदायिक तनाव का रूप लेने लगते हैं, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय है।

मामला शहर के भीतरी हिस्से में किल्ली खाना और आचार्य मोहल्ले का है, जहां घुड़ला मेले के दौरान शुक्रवार देर रात विवाद हो गया। गणगौर पर्व से जुड़ी धार्मिक रस्में पूर्ण कर लौट रही महिलाओं के जुलूस में कुछ बाइक सवार युवक घुस गए। बताया जा रहा है कि युवक नशे की हालत में थे। जुलूस में व्यवधान से विवाद शुरू हुआ, जो देखते ही देखते मारपीट में बदल गया। स्थानीय लोगों ने युवकों को खदेड़ दिया, लेकिन मामला यहीं शांत नहीं हुआ। कुछ देर बाद वे अन्य लोगों के साथ लौटे और पत्थरबाजी तक की नौबत आ गई। महिलाओं पर पत्थर फेंके गए, जिससे माहौल और बिगड़ गया। एक बाइक को आग लगाने का प्रयास भी किया गया, जिसने आक्रोश को और भड़का दिया। इसके बाद लोगों ने आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। पुलिस ने मामले पर काबू पा लिया, लेकिन ये संकेत गंभीर है।

यह कोई पहली घटना नहीं है। मई 2022 में जालोरी गेट चौराहे पर झंडा लगाने को लेकर भी दो समुदायों के बीच गंभीर साम्प्रदायिक विवाद हुआ था। हालात इतने बिगड़े कि शहर में कफ्र्यू तक लगाना पड़ा और कई दिनों तक तनाव का वातावरण बना रहा। इसी तरह जून 2024 में सूरसागर क्षेत्र में गेट निर्माण को लेकर दो समुदाय आमने-सामने आ गए थे। उस विवाद ने भी साम्प्रदायिक सौहार्द को गहरी चोट पहुंचाई थी।

इन घटनाओं की श्रृंखला यह दर्शाती है कि समस्या केवल कानून-व्यवस्था की नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और जिम्मेदारी की भी है। सवाल यह है कि आखिर क्यों हर छोटी घटना इतनी जल्दी सामूहिक टकराव का रूप ले लेती है? क्या हम सहनशीलता और संवाद की संस्कृति को खोते जा रहे हैं? क्या अफवाहें और उकसावे की राजनीति हमारे सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही हैं?

जोधपुर की पहचान उसकी विविधता में एकता रही है। यहां सदियों से विभिन्न समुदाय मिल-जुलकर रहते आए हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि समाज के सभी वर्ग आत्ममंथन करें। युवाओं को विशेष रूप से संयम और जिम्मेदारी का परिचय देना होगा, क्योंकि अक्सर ऐसे विवादों में वही अग्रिम पंक्ति में दिखाई देते हैं। धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में अनुशासन बनाए रखना और प्रशासन के निर्देशों का पालन करना भी उतना ही आवश्यक है। प्रशासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। संवेदनशील इलाकों में सतर्कता, त्वरित कार्रवाई और विश्वास बहाली के प्रयास निरंतर होने चाहिए। साथ ही, अफवाहों पर नियंत्रण और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई से ही लोगों में भरोसा कायम रहेगा। लेकिन केवल प्रशासन के भरोसे शांति कायम नहीं रह सकती। इसके लिए सभी समाजों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।

आज जरूरत इस बात की है कि हम जोधपुर की मूल पहचान अपणायत, भाईचारे और सम्मान को फिर से मजबूत करें। छोटी-छोटी बातों को तूल देने के बजाय संवाद और समझदारी का रास्ता अपनाएं। यह शहर हम सबका है, और इसकी गंगा जमुनी तहजीब को बचाए रखना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है। अगर हम समय रहते नहीं संभले, तो ऐसी घटनाएं न केवल शहर की छवि को धूमिल करेंगी, बल्कि आने वाली पीढिय़ों के लिए भी एक गलत उदाहरण पेश करेंगी। हम सब को एक चीज अपने आचरण में लानी है वह है सहनशीलता। तभी अपणायत और शहर सुकून से अपने मूल्यों के साथ आगे बढ़ता रहेगा।
sandeep.purohit@in.patrika.com