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Nirjala Ekadashi 2023: क्यों इतनी खास होती है निर्जला एकादशी, जानिए इस व्रत से जुड़ी कथा

पर्यावरण संरक्षण एवं जल के महत्व से जुड़े धार्मिक पर्व पर वैष्णव मंदिरों में विशेष अनुष्ठान किए जाएंगे। धार्मिक - सामाजिक स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से जगह - जगह शीतल शर्बत का वितरण किया जाएगा ।
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जोधपुर। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी बुधवार को निर्जला ग्यारस (Nirjala Ekadashi 2023) के रूप में मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह की एकादशी तिथि मंगलवार (Nirjala Ekadashi shubh muhurat) को दोपहर 1:32 बजे शुरू हो गई और समापन बुधवार को दोपहर 1:36 बजे पर होगा। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत बुधवार को रखा जाएगा।

पर्यावरण संरक्षण एवं जल के महत्व से जुड़े धार्मिक पर्व पर वैष्णव मंदिरों में विशेष अनुष्ठान किए जाएंगे। धार्मिक - सामाजिक स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से जगह - जगह शीतल शर्बत का वितरण किया जाएगा । श्रद्धालु शारीरिक क्षमतानुसार बगैर जलग्रहण किए उपवास का संकल्प लेंगे। धार्मिक स्थलों पर ऋतु फल , चीनी से बने ओळे व पानी से भरे मिट्टी के जलपात्र रखे जाएंगे। गरीब जरूरतमंदों को भी आज सहित ऋतु फल बांटे जाएंगे। शिवालयों में सहस्त्रघट अभिषेक तथा गोशालाओं में विशेष पूजन किया जाएगा । निर्जला एकादशी पर आम, शर्बत, मटकी व दूध से बनी मिठाई का दान करने की परम्परा के चलते इन वस्तुओं के व्यापार में तेजी आई। वहीं मंगलवार को गंगा दशहरा (गंगा दशमी) के अवसर पर शहरवासियों ने पवित्र सरोवरों में स्नान कर दान-पुण्य किए। शहर के अधिकांश लोग बैरी गंगा तीर्थ स्थल गए व आस्था की डुबकी लगाई।

आपको बता दें कि देवर्षि नारद ने पिता व सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी से कहा कि हे परमपिता! मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे मैं जगत के पालनकर्ता श्रीविष्णु भगवान के चरणकमलों में स्थान पा संकू। पुत्र नारद का नारायण प्रेम देखकर ब्रह्मा जी ने श्रीविष्णु की प्रिय निर्जला एकादशी व्रत करने का सुझाव दिया। नारद जी ने प्रसन्नचित्त होकर पूर्ण निष्ठा से एक हजार वर्ष तक निर्जल रहकर यह कठोर व्रत किया। हजार वर्ष तक निर्जल व्रत करने पर उन्हें चारों तरफ नारायण ही नारायण दिखाई देने लगे। परमेश्वर नारायण की इस माया से वे भ्रमित हो गए, उन्हें लगा कि कहीं यही तो विष्णु लोक नहीं। तभी उनको भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन हुए। मुनि नारद की भक्ति से प्रसन्न होकर विष्णुजी ने उन्हें अपनी निश्छल भक्ति का वरदान देते हुए अपने श्रेष्ठ भक्तों में स्थान दिया और तभी से निर्जल व्रत की शुरुआत हुई।

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