
राजस्थानी संस्कृति, नारी स्वाभिमान, पतिव्रता धर्मपरायण एवं सुन्दरता का पर्याय चितौड़ की राणी पद्मिनी भारतीय जनमानस में एक विशिष्ठ वीरागंना के रूप में शाश्वत स्थान प्राप्त कर चुकी है। राजपूताना के गौरवशाली इतिहास में राणी पद्मिनी एक ऐसी अद्भुद और महान चरित्र नायिका है जिसने पूरी दुनिया में राजस्थानी संस्कृति और नारी समाज को गौरवान्वित किया है। राणी पद्मिनी की कथा हमारे देश के अत्यंत दुखद, संकटपूर्ण और विपत्तिजनक समय की ह्रदय विदारक स्मरण कराती है। पद्मिनी कोई कल्पित और केवल मनोरंजक कहानी की सामान्य नायिका नहीं है। वह हमारी गौरवशाली संस्कृति, नारी स्वाभिमान और गरिमा की वास्तविक ज्योति की प्रतीक-सी प्रज्ज्वलित दीपिका थी। यह श्रृंगार-प्रधान काव्य रस का विषय नहीं है। पद्िमिनी पर जैन संत कवि हेमरत्न ने अपनी काव्य रचना 'गोरा बादिल पद्मिनी चरित चऊपईÓ की रचना की। इस काव्यरचना के अंत में स्वयं कवि ने ही लिखा है कि यह रचना संवत 1643 माघ सुदी पूनम को सादड़ी (वर्तमान पाली जिले के अंतर्गत) में पूर्ण हुई। राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति के मर्मज्ञ विद्धान, पुरातत्वाचार्य मुनि श्रीजैन विजय द्वारा संपादित इस गौरवशाली ग्रंथ का प्रथम प्रकाशन जोधपुर स्थित राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान ने फरवरी 1968 में किया। कवि हेमरत्न के इस कथा सूत्र में असंभवनीय घटना का किंचित भी आभास नहीं है क्योंकि घटना क्रमबद्ध व स्वाभाविक ढंग से वर्णित है।
प्राचीन साहित्य में महाराणी पद्मिनी
1. पद्मावत: मलिक मोहम्मद जायसी (संवंत 1620)
2. गोरा-बादिल चऊपई: कवि हेमरत्न (संवंत 1646, सादड़ी)
3. पद्मिनी चरित चऊपई: कवि लब्धोदय (संवंत 1706-07)
4. पद्मिनी चरित: कवि जटमल नाहर
5. गोरा-बादिल कवित: कवि मल्ल
6. छप्पय चरित: कवि पत्ता
7. राज-प्रशस्ति काव्य: कवि भट्ट रणछोड़
8. अमर-काव्य: कवि भट्ट रणछोड़
9. खुमाण रासौ: दलपत विजय
10. राणौरासौ: दयालदास
11. वीर-विनोद: श्यामलदास
12. मुहता नैणसी री ख्यात: मुहता नैणसी (राजस्थान पुरातन ग्रंथमाला, भाग-1, पृष्ठ-14)
13. राजस्थान के लोक साहित्य में महाराणी पद्मिनी बुद्धिमत्ता, रूपवान, गुणवान, शीलवान, राजस्थानी संस्कृति का सरूप तथा एक वीरांगना के रूप में प्रतिष्ठापित है जिसके प्रति लोक के ह्रदय में अटूट आस्था बनी हुई है।
मलिक मोहम्मद जायसी की पद्मावत
मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्मावत की रचना अवधी भाषा में की है जिसका मूल स्त्रोत 'जन श्रुतियांÓ है। यह रचना संवत 1620 के आसपास लिखी गई। उन्होंने स्वयं ही इस बात को स्वीकार किया है कि 'मैनें इस प्रेम कथा को जोड़कर, कविताबद्ध कर लोगों को सुनाया है। जिसने भी इस कथा को सुना है, उसने प्रेम की पीड़ा के महत्व को अनुभव किया है।Ó अर्थात जायसी की कथा केवल प्रेम की पीड़ा को अभिव्यक्त करने वाली एक रूपक मात्र है क्योंकि कथा का मर्म कोई वास्तविक अर्थ नहीं रखता।
इतिहास की दृष्टि से महाराणी पद्मिनी
1. मध्य काल के प्रमुख इतिहासकारों में फिरिस्ता, जियाउद्दिन बर्नी, इसामी तथा अमीर खुसरो जैसे नाम हैं जो सीधे दिल्ली सल्तनत से जुड़े हुए और अलाउद्दीन खिलजी के समकालीन भी थे। इनमें से अमीर खुसरो ने महाराणी पद्मिनी का उल्लेख ही नहीं किया जबकि अन्य तीनों ने पद्मिनी और चित्तौड़ पर आक्रमण की घटना का उल्लेख किया।
2. डॉ. कालिका रंजन कानूनगो- स्टडीज इन राजपूत हिस्ट्री
3. गौरीशंकर हीराचंद ओझा- उदयपुर राज्य का इतिहास
4. अबुल फजल- आइने अकबरी
5. कर्नल टॉड- राजपूताने का इतिहास
6. डॉ. दशरथ शर्मा- राजस्थान का इतिहास
उपरोक्त इतिहासकारों ने महाराणा रत्नसिंह चितौड़ और अलाउद्दीन खिलजी का उल्लेख किया है। ये इतिहासकार महाराणी पद्मिनी की ऐतिहासिक सत्यता को भी मानते हैं मगर घटित घटना के विषय में सबके अपने-अपने अलग-अलग तर्क है
Published on:
20 Nov 2017 05:24 pm
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