
जोधपुर . मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जोधपुर जिला के पीठासीन अधिकारी देवकुमार खत्री की अदालत में मंगलवार को काले हिरण शिकार मामले में अभियोजन की ओर से कानूनी बिन्दुओं पर जवाबी बहस की। गत 24 मार्च को इस मामले के सभी आरोपी की ओर से अंतिम बहस समाप्त हो गई थी। मंगलवार को लोक अभियोजन अधिकारी भवानीसिंह भाटी ने बचाव पक्ष द्वारा उठाये गए सभी बिंदुओं पर सिलसिलेवार कानूनी जवाब दिया। उन्होनें प्रथम सुचना रिपोर्ट, अनुसंधान में रही त्रुटिया, सीआरपीसी कानून के क्षेत्राधिकार, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धाराओं,चश्मदीद गवाह ,अनुसंधान अधिकारी तथा शूटिंग की अनुमति के सम्बन्ध में अंतिम जवाब बहस की। भाटी ने कहा कि शिकार मामलों में सामान्यतः वन्यजीव संरक्षण अधिनियम ही लागु होता है । इसके अंतर्गत वन्य जीवों के शिकार मामले की प्रथम सुचना रिपोर्ट की रिपोर्टिंग 24 घंटे में विभाग के उच्चाधिकारी को करनी होती हैं, न्यायालय को नहीं। घटना के छह दिन बाद एफआईआर कोर्ट में पेश करने के बचाव पक्ष की दलील पर अभियोजन अधिकारी भाटी ने यह बात कही । उन्होनें पीठासीन अधिकारी को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत प्रचलित एफआईआर के नमूना प्रपत्र को देखाते हुए कहा कि यह कार्बन कापी के बजाय तीन प्रतियों में होता है इसलिए आंशिक बदलाव हो सकता है। भाटी सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के आधार पर सभी बिंदुओं पर बहस की। उन्होनें कहा कि शूटिंग की अनुमति फिल्मी सितारों को नहीं बल्कि फिल्म निर्माता को दी थी। कानूनी बहस के दौरान सलमान खान के अधिवक्ता हस्तीमल सारस्वत, सेफअली,नीलम तथा सोनाली के अधिवक्ता केके व्यास,तब्बू के अधिवक्ता मनिष सिसोदिया तथा विश्नोई समाज से अधिवक्ता महीपाल सिंह उपस्थित थे।
पुलिस अभिरक्षा में दी गई स्वीकारोक्ति महत्वहीन नहीं
अभियोजन ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का हवाला देते हुए कहा कि शिकार मामलों में वन्यजीव कानून लागू होता है। इसके अंतर्गत पुलिस तथा अनुसंधान अधिकारी की अभिरक्षा में आरोपी की स्वीकारोक्ति सुसंगत है। आमतौर पर सीआरपीसी की धारा 25 के तहत पुलिस अभिरक्षा में आरोपी के बयान महत्वहीन होते हैं। गौरतलब है कि इस मामले के पुलिस अभिरक्षा के दौरान सलमान ने हथियारों के सम्बन्ध में बयान दिये थे। अभियोजन अधिकारी भाटी ने यह भी कहा कि अनुसंधान अधिकारी शिकार के हर मामले में व्यक्तिगत रुचि लेकर ही आरोपी के अनुसंधान करते है ।यह बात उन्होनें बचाव पक्ष की उस दलील पर दिया जिसमें अनुसंधान अधिकारी पर निजी तौर पर काम करने का संदेह व्यक्त किया गया था।