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राजस्थान के ‘बर्डमैन’ के नाम से विख्यात हैं सेवाराम माली, प्रवासी पक्षियों के लिए खर्च की जीवन की जमा पूंजी

Migratory bird protection: फलोदी में खीचन क्षेत्र के निवासी सेवाराम आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। पेशे से मजदूर सेवाराम बीते 27 वर्षों से ​पक्षियों की सेवा में समर्पित हैं और इसके लिए उन्होने अपने जीवन की जमापूंजी तक को खर्च करने में कोई कसर नहीं रखी है।

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प्रवासी पक्षी कुरजां की सेवा में समर्पित सेवाराम व उनका पुत्र चिराग, पत्रिका फोटो

प्रवासी पक्षी कुरजां की सेवा में समर्पित सेवाराम व उनका पुत्र चिराग, पत्रिका फोटो

Migratory bird protection: फलोदी में खीचन क्षेत्र के निवासी सेवाराम आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। पेशे से मजदूर सेवाराम बीते 27 वर्षों से ​पक्षियों की सेवा में समर्पित हैं और इसके लिए उन्होने अपने जीवन की जमापूंजी तक को खर्च करने में कोई कसर नहीं रखी है। प्रवासी पक्षी कुरजां की सेवा और रक्षा के लिए उन्होने अपना घर भी समर्पित कर दिया। ऐसे में उनका घर अब क्षेत्र का सबसे चर्चित टूरिस्ट स्पॉट बन गया है।

खीचन प्रवासी पक्षियों का ठिकाना

साइबेरिया में सर्दियों में पारा माइनस 50 से 60 डिग्री तक गिर जाता है। ऐसे में वहां से पक्षी डेमोइसेल क्रेन साइबेरिया के टाइवा क्षेत्र से उड़ कर 3676 किलोमीटर की दूरी तय कर फलोदी जिले के खीचन में आ जाती हैं। ये क्रेन अगस्त–सितम्बर से लेकर मार्च तक यहीं रहती हैं। फिर मार्च में क्रेन फिर से साइबेरिया पहुंच जाती हैं। हजारों की संख्या में प्रवासी क्रेन पिछले 1970 से यहां आ रही हैं और करीब 6 महीने खीचन ही इनका निवास स्थान बन जाता है।

प्रवासी पक्षियों को 27 साल से रेस्क्यू में जुटे

सेवाराम माली के अनुसार प्रवासी प​क्षी कुरजां (डेमोइसेल क्रेन) बिजली के तार से करंट की चपेट में आकर घायल होती थी। जिसे रेस्क्यू किया गया। तभी से उनका इन कुरजां से आत्मिक रिश्ता बन गया। 27 साल में उन्होने हजारों कुरजां को रेस्क्यू किया। सभी रेस्क्यू पक्षियों का रिकॉर्ड भी रजिस्टर में मेंटेन किया है।

सेवाराम माली का कहना है कि बिजली के तार से कुरजां के टकराकर घायल होने व जान गंवाने के मामले को उन्होंने प्रमुखता से उठाया जिस पर कोर्ट ने संज्ञान लेकर क्षेत्र में बिजली के तारों को भूमिगत करने के आदेश दिए।

घर बना टूरिस्ट पॉइंट

सेवाराम का घर अब टूरिस्ट पॉइंट का रूप ले चुका है। सेवाराम के घर के पास का क्षेत्र कुरजां का चुग्गा घर है। सुबह 20 से 25 हजार कुरजां यहां आकर दाना चुगती हैं और एक साथ उड़ान भरती हैं।
सुबह-सुबह का यह नजारा देखने देसी–विदेशी टूरिस्ट सेवाराम के घर पहुंचते हैं। छत से डेमोइसेल क्रेन की अठखेलियां देखते हैं। कैमरे में कैद करते हैं।

सेवाराम हर दिन कुरजां कितने बजे आती हैं? कितने बजे दाना चुगती हैं? कितनी बजे उड़ कर तालाब की तरफ जाती हैं… इस सबकी डिटेल रजिस्टर में लिखते हैं। यही नहीं कितनी कुरजां आईं, उनकी संख्या भी लिखते हैं। चुग्गा घर में आने वाली कुरजां के पैरों में टैग लगे होते हैं, जिसकी जानकारी भी सेवाराम रखते हैं।

सेवाराम को मिले कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान

प्रवासी पक्षियों की सेवा को लेकर प्रयासरत सेवाराम को कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं। वीई फ्लिंट क्रेन वर्किंग ग्रुप ऑफ यूरेशिया ने सेवाराम को फलोदी आकर सम्मानित किया। इसके साथ ही सेवाराम को लोकल, स्टेट, नेशनल और इंटरनेशनल वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन अवॉर्ड मिले हैं।

तीन ​पीढ़ी प्रवासी पक्षियों की कर रही सेवा

सेवाराम के बेटे चिराग और पीयूष भी पिता के साथ क्रेन की सेवा में जुट गए हैं। चिराग ने बताया कि वह अपने पिता के साथ कुरजां कंजर्वेशन में सहयोग करता है। चिराग सातवीं क्लास में पढ़ रहा है। मंगोलिया से बर्ड रिसर्चर कुरजां के पैर पर जो टैग लगाते हैं, उनको पहचान कर टैग की फोटो लेता है। यहां पक्षी विशेषज्ञ उस पर रिसर्च करते हैं। इस कार्य के लिए चिराग व पीयूष को भी कई पर्यावरण संस्थाएं सम्मानित कर चुकी हैं।

1800 बीघा जमीन कुरजां रिजर्व

आवारा कुत्तों का शिकार होती कुरजां को बचाने के लिए सेवाराम ने कई प्रयास किए। हाईकोर्ट के निर्देश पर देश का पहला कुरजां कंजर्वेशन रिजर्व बनाया गया। वर्तमान में खीचन में 1800 बीघा जमीन कुरजां के लिए रिजर्व है।

इसके अलावा चुग्गाघर की 2 बीघा 2 बिस्वा जमीन का पट्‌टा भी कुरजां पक्षियों के नाम है। 1989 में ग्राम पंचायत खीचन व फलोदी ने नि:शुल्क यह जमीन कुरजां व कबूतर चुग्गा (दाना) स्थल के रूप में दे दी। यहां लाखों रुपए का चुग्गा (दाना) डाला जाता है, जिसकी व्यवस्था गांव का जैन समाज व ग्रामीण मिलकर करते हैं।