
जोधपुर में पत्थर की खदान। फाइल फोटो
सुरेश व्यास/जोधपुर। प्रदेश में पत्थर की खदानों में काम करने वाले हजारों खान मजदूर जानलेवा सिलिकोसिस बीमारी का शिकार होकर दुनिया छोड़ गए, लेकिन इनकी बेवाओं और बच्चों को आज भी सरकार की नीति के तहत मिलने वाले मुआवजे व मासिक पेंशन का इन्तजार ही है। न इनके परिवारों को हक पता है और न ही सरकार ऐसे लोगों तक पहुंच पाई है। हक मांगने पहुंचे लोगों के प्रति भी सरकारी मशीनरी का रवैया टालमटौल का रहता है। कई लोग मानवाधिकार आयोग की शरण में गए हैं तब भी न्याय अभी लालफीताशाही में ही उलझा हुआ है। हाल ही आयोग ने जोधपुर के जिला कलक्टर को एक मामले में यह बताने के लिए व्यक्तिगत रूप से तलब किया है कि खान श्रमिक की विधवा को दस साल बाद भी मुआवजा क्यों नहीं मिला।
प्रदेश में 33 में से 19 जिलों की 33 हजार 122 खदानों में 30 लाख से अधिक मजदूर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रोजगार हासिल करते हैं। इनमें सर्वाधिक श्रमिक पत्थर खदानों में नियोजित हैं। ये ही लोग सिलिकोसिस जैसी जानलेवा बीमारी का शिकार होते हैं।
जोधपुर के अलावा करौली, बूंदी, अलवर, भरतपुर और भीलवाड़ा में बड़े पैमाने पर पत्थर की खदानों में लगे श्रमिक लगे खान में उड़ने वाले धूल कण श्वास के साथ फेफड़ों तक पहुंचने से सिलिकोसिस जैसी खतरनाक बीमारी का शिकार हुए हैं।
विधवाओं के आंकड़े ने चौंकाया
खान श्रमिकों की सहायता के लिए काम कर रहे खान मजदूर सुरक्षा अभियान (एमएलपीसी) के साल 2007 में जोधपुर में करवाए गए एक सर्वे के दौरान सामने आया कि खदानों में काम करने वाली 48 प्रतिशत महिलाएं विधवाएं हैं। इन सभी ने अपने पति की मौत का कारण टीबी को बताया। इस आंकड़े से विशेषज्ञ भी चौंक गए क्योंकि टीबी से इतनी बड़ी संख्या में मौतें नहीं हो सकती। रिकार्ड देखने की बात सामने आई तो अधिकांश ने पति की मौत के बाद इलाज के कागज जला तक दिए थे। मात्र 22 विधवाओं के पास अस्पताल के डिस्चार्ज टिकट मिले। इन्हें देखने पर पता पड़ा कि मौत टीबी से नहीं सिलिकोसिस से हुई है। इसके अलावा चार दर्जन जीवित खान श्रमिकों के डिस्चार्ज टिकट में भी सिलिकोसिस बीमारी का उल्लेख मिला। इसके बाद छिड़ी मुहीम से राज्य में नीति भी बनी, लेकिन इसके क्रियान्वयन पर आज भी सवालिया निशान ही लगा है।
पांच जिले सर्वाधिक प्रभावित
प्रदेश में जोधपुर, करौली, सिरोही, भरतपुर व नागौर जिलों के सर्वाधिक खान श्रमिक सिलिकोसिस की बीमारी से पीड़ित हैं। आंकड़ों में 27 हजार 463 श्रमिकों को तो सिलिकोसिस की पुष्टि हो चुकी है और लगभग 21 हजार श्रमिकों के मामले अभी चिकित्सकीय जांच में अटके हैं।
कहां कितने श्रमिक प्रभावित
जिला---सिलिकोसिस पीड़ित----सीएचसी/पीएचसी में लंबित---मेडिकल बोर्ड में लंबित---निस्तारण
जोधपुर--- 5799---2214---1982---772
करौली---4048-----615----1167---139
सिरोही---1904----2712----387----72
भरतपुर---2728----95------154----17
नागौर----1620-----22--------6-----479
(आंकड़े 25 जनवरी 2022 तक के)
एक्सपर्ट कमेंट
राजस्थान में सिलिकोसिस महामारी अधिनियम 1957 तक में शामिल है। प्रदेश में पहली बार 2 अक्टूबर 2019 से नीति बनाकर सिलिकोसिस जैसी बीमारियों की रोकथाम व प्रभावित श्रमिकों की मदद के लिए फ्रेमवर्क बनाया गया। फिर भी सिलिकोसिस पीड़ितों व उनके परिवारों की स्थिति दयनीय बनी हुई है। कई खामियों के चलते नीति लागू नहीं हो पा रही।
नीति के तहत पीड़ित को तीन लाख रुपए की तात्कालिक सहायता और मृत्यु हो जाने पर आश्रितों को दो लाख रुपए मुआवजे व विधवा को 1500 रुपए प्रतिमाह पेंशन का प्रावधान है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि बमुश्किल दस फीसदी पीड़ितों को भी इसका फायदा नहीं मिला है। पीड़ित परिवारों की अशिक्षा और जागरुकता का अभाव के साथ सरकारी मशीनरी की उदासीनता के कारण भी नीति के अनुरूप काम नहीं हो रहा। नीति बनने से पहले भी सिलिकोसिस को लेकर कई कानूनी प्रावधान थे।
इसके तहत बीमारी का पता लगते ही चिकित्सक को मामले की जानकारी तुरंत खान सुरक्षा निरीक्षक या फैक्ट्री इंस्पेक्टर को देनी होती है, लेकिन साल 2010 तक 987 मामलों में यह जानकारी नहीं दी गई। विडम्बना है कि आज बारह साल बाद भी ये मामले नोटिफाइड नहीं हो सके हैं। सरकारी विभागों में समन्वय का अभाव भी बाधक बना हुआ है।
-राना सेनागुप्ता, ट्रस्ट्री, एमएलपीसी, जोधपुर
Published on:
04 Feb 2022 06:51 pm
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