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WILDLIFE STORY : फिसलते पारे के बीच पक्षियों की संख्या में हुआ इजाफा

पत्रिका न्यूज़ नेटवर्कफलोदी. सात समन्दर पार जब मंगोलिया, चीन, कजाकिस्तान आदि कुरजां के मूल स्थानों पर कड़ाके ठण्ड और बर्फबारी होती है, तो ये पक्षी भोजन और सुरक्षित आवास के लिए प्रतिवर्ष शीतकालीन प्रवास पर निकल जाते है।

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फलोदी. कुरजां की अठखेलियां

फलोदी. कुरजां की अठखेलियां

यहां सर्दियों का तापमान कुरजां के लिए काफी अनुुकूल होता है, एैसे में इन पक्षियों के लिए यहां सितम्बर से फरवरी माह तक समय सुकून से भरा होता है। इस बीच अगर तापमान में वृद्धि होती है, तो ये पक्षी स्थानीय आस-पास इलाकों में प्रवसन कर जाते है और तापमान में गिरावट के साथ ही खीचन में कुरजां की संख्या में इजाफा हो जाता है।
पक्षी प्रेमी सेवाराम माली ने बताया कि इस बार शीतकालीन प्रवास पर आए मेहमान पक्षियों की गत दिनों एक साथ ३७ कुरजां की मौत के बाद अब कुरजां का विचरण फिर से सामान्य हो गया है। अब जैसे-जैसे सर्दी बढ़ रही है और तापमापी का पार फिसल रहा है, वैसे-वैसे खीचन में पक्षियों की संख्या में इजाफा हो रहा है। कुरजां की संख्या इस प्रवास की अधिकतम संख्या १५ हजार के करीब पहुंच गई है। खीचन में इन दिनों सुबह पक्षी चुग्गाघर और दोपहर से शाम तक तालाब से कुरजां की अठखेलियों से गुलजार है। इन पक्षियों की खूबसूरत अठखेलियों को देखने के लिए खीचन में दिन-भर देशी-विदेशी पर्यटकों की रेलमपेल लगी रहती है।
चुग्गाघर से ज्यादा तालाबों पर है पक्षियों की संख्या-
इन दिनों कुरजां सुबह करीब ७ बजे खीचन गांव के आसमान में विचरण शुरू कर देती है तथा सुरक्षा व्यवस्थाओं का जायजा लेने के बाद ये पक्षी करीब ८ बजे चुग्गाघर में उतरकर दाना लेते है। पिछले कुछ दिनों से देखा जा रहा है कि चुग्गाघर में पक्षियों की संख्या कम है तथा तालाबों पर कुरजां की संख्या ज्यादा है।
फोटोग्राफी का बढ़ा क्रैज-
कुरजां के मनमोहक दृश्यो को कैमरे कैद करने के लिए कई विदेशी पर्यटक रूचि रखते है। साथ ही स्थानीय युवाओं में भी कुरजां की फोटोग्राफी लेकर क्रैज बढ़ा है। यहां प्रतिदिन कई विशेषज्ञों के अलावा फोटोग्राफी के शौकीन लोग भी पहुंचते है।
मार्च में होगी वतन वापसी-
शीतकालीन प्रवास पर खीचन आए मेहमान पक्षी सितम्बर से फरवरी माह तक यहां प्रवास करते है तथा ग्रीष्म ऋतु की दस्तक के साथ ही मार्च में पक्षियों के समूह वतन वापसी शुरू कर देते है। मार्च के बाद खीचन गांव के इन पक्षियों के बिना सूना हो जाता है। (कासं)

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