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WATCH : पर्यटकों की फेवरिट डेस्टिनेशन है जोधपुर का तूरजी का झालरा, बेशकीमती विरासत का है बेजोड़ नमूना

छोटी सडक़ और तंग रास्तों से हो कर मकराना मोहल्ला पहुंचा जाता है। यह इलाका चारों तरफ हैरिटेज गेस्ट हाउसेज से घिरा हुआ है। जो पर्यटक यहां आते हैं वह यहां का प्रख्यात झालरा देखना नहीं भूलते। यह है तूर जी का झालरा।

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toorji ka jhalra is favorite tourist destination in jodhpur

WATCH : पर्यटकों की फेवरिट डेस्टिनेशन है जोधपुर का तूरजी का झालरा, बेशकीमती विरासत का है बेजोड़ नमूना

वीडियो क्रेडिट : जेके भाटी/जोधपुर. शहर में पुराने परंपरागत जलस्रोत बेशकीमत विरासत की हैसियत रखते हैं। ये जलाशय जल संग्रहण और जल प्रबंधन की अद्वितीय मिसालें रहे हैं। समय के साथ इन जलाशयों का महत्व भुला दिया गया। आज जब जब कायलाना-तखतसागर में पानी का स्तर कम होता है और शहर की जलापूर्ति व्यवस्था चरमराती है तो सहसा ही हमारे पुरखों की विरासत इन जलाशयों की याद ताजा हो आती है।

महारानी ने निभाई जलाशय बनाने की परंपरा
छोटी सडक़ और तंग रास्तों से हो कर मकराना मोहल्ला पहुंचा जाता है। यह इलाका चारों तरफ हैरिटेज गेस्ट हाउसेज से घिरा हुआ है। जो पर्यटक यहां आते हैं वह यहां का प्रख्यात झालरा देखना नहीं भूलते। यह है तूर जी का झालरा। राजपरिवार की महिलाओं ने सार्वजनिक जलाशय बनवाने की बरसों पुरानी परंपरा का निर्वाह करते हुए यह झालरा बनवाया था। आजकल यह झालरा लोगों में आकर्षण का केंद्र है। देसी विदेशी पर्यटक इसकी जल प्रणाली और कलात्मकता देख अभिभूत हो जाते हैं। यह एक संयोग ही कहा जाएगा कि आज यह जलाशय सैलानियों में चर्चा का विषय है।

मीठे पानी के झालरे का किस्सा
इतिहास के अनुसार जोधपुर के महाराजा अभयसिंह की महारानी तंवर तूर रानी ने सन 1740 में झालरा बनवाया था जिसके कारण उसका नाम तुरजी का झालरा पड़ा। झालरे के पानी का प्रयोग मुख्य रूप से महिलाएं ही करती थीं। क्योंकि पानी भर कर लाना और एकत्रित करना महिलााओं का ही काम था। यह झालरा दशकों से गहरे पानी में डूबा हुआ है। जीर्णोद्धार से 200 फीट गहरी बेमिसाल विरासत सामने आई है। यह जोधपुर का घाटू लाल पत्थर तराश कर बनाई गई है। इसमें आकर्षक नृत्य करते हाथियों की महीन लुभावनी नक्काशी, पानी के मध्यकालीन शेर और गाय मुख्य स्रोत नल हैं।

इंजीनियरिंग मार्वल का बेजोड़ नमूना
राजा महाराजाओं के जमाने में जोधपुर में एक काम सबसे अच्छा यह हुआ कि वाल सिटी एरिया को वाटर बॉडीज से सजाया गया। रानीसर, पदमसर, नाजर जी की बावड़ी, तूर जी का झालरा, गुलाबसागर और फतेहसागर रियासतकाल के बहुत महत्वपूर्ण कार्य हैं। इन्हें केवल जलस्रोत नहीं समझना चाहिए। ये इंजीनियरिंग मार्वल हैं। इनके माध्यम से बारिश की हर बूंद का जुड़ाव होता था। शहर की बावडिय़ां भी इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। इन्हें फिर से रिवाइज किया जा सकता है।
- अनु मृदुल, विख्यात आर्किटेक्ट

तूरजी का झालरा सहित 16 बावडिय़ों पर डाक टिकट
डाक विभाग ने देश की 16 प्राचीन बावडिय़ों पर डाक टिकट जारी किए हैं। इनमें राजस्थान की छह ऐतिहासिक बावडिय़ां शामिल हैं। डाक निदेशक कृष्णकुमार यादव ने बताया कि राजस्थान में जोधपुर के तूरजी का झालरा, जयपुर की पन्ना मियां की बावड़ी, आभानेरी की चांद बावड़ी, बूंदी की रानीजी की बावड़ी, नागर-सागर कुंड और अलवर की नीमराना बावड़ी पर डाक टिकट जारी किए गए हैं। इनमें से नीमराना बावड़ी व नागर सागर कुंड पर जारी डाक टिकट 15 रुपए के और शेष डाक टिकट 5 रुपए के हैं।