जोधपुर. देश के उपराष्ट्रपति व राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने संसद में सांसदों के बर्ताव पर नाराजगी जताते हुए कहा कि जनता सांसदों को डिबेट और डायलॉग डिलिवरी के लिए भेजती है न की डिस्टर्बेंस के लिए। उन्हें संसद में चर्चा में भाग लेना चाहिए लेकिन वे व्यवधान पैदा करते हैं। मेरी आप सबसे अपील है कि हमेशा दूसरों के दृष्टिकोण का सम्मान करें। भले ही आप उससे सहमत नहीं हो, उसे स्वीकार नहीं करें लेकिन सम्मान करें। यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए जरूरी है।
धनखड़ बुधवार शाम को यहां राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू) जोधपुर में छात्रों से संवाद कार्यक्रम के अंतर्गत पहुंचे। वे करीब डेढ़ घंटे तक यहां रुके। उन्होंने अपने भाषण में संसद की सर्वाेच्चता और संप्रुभता को रेखांकित करते हुए कहा कि लोकतंत्र के तीनों पायदान कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका में शक्तियों का पृथक्करण स्पष्ट है। तीनों को एक-दूसरे के क्षेत्र में घुसपैठ नहीं करनी चाहिए। अंत में संसद ही अंतिम निर्णय लेती है। संसद की संप्रभुता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। वह लोगों की आकांक्षाओं का अंतिम उम्मीद है।
जो भारत को शर्मिंदा करते हैं, उसे जवाब दो
धनखड़ ने कहा कि किसी को भी बगैर कारण देश को शर्मिंदा करने की इजाजत नहीं दी सकती। एनएलयू छात्रों से उपराष्ट्रपति ने आह्वान किया कि अगर कोई ऐसा करता है तो आप उसे जवाब दो। भारत विरोधी तत्वों को न्यूट्रेलाइज करो।
विधि के छात्रों को बताया कानून का महत्व
एलएलयू के छात्रों ने भारतीय दण्ड संहिता को भारतीय न्याय संहिता में बदलने का प्रश्न किया तो धनखड़ बोले कि पहले कानून सुधारवादी नहीं थे। दंडात्मक थे, जो औपनिवेशिक शासन की याद दिलाते हैं।
मैं ही हूं ना
धनखड़ ने पश्चिम बंगाल में राज्यपाल पद के दौरान का किस्सा साझा करते हुए कहा कि एक बार सीएम ममता बैनर्जी ने मैं हू ना का पोस्टर छपवाया। मैंने भी इसमें अवसर देखा और मैं ही हू ना, का पोस्टर छपवा लिया। छात्रों से कहा कि जो भी अवसर मिले, उससे चूको मत।
भारत शब्द का उपयोग
उपराष्ट्रपति धनखड़ ने अपना भाषण अंग्रेजी में दिया लेकिन अधिकांश बार इंडिया की जगह भारत शब्द का इस्तेमाल किया।