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राजस्थान में यहां पेड़-पौधे भी सुनते हैं गीता, भागवत और हनुमान चालीसा, वैज्ञानिक दृष्टि से भी प्रमाणित

धार्मिक स्तुति-पाठ यानी स्प्रिचुअल म्यूजिक थेरेपी से बढ़ती है पौधों की 20 -25 प्रतिशत तक वृद्धि  

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Plantation with spiritual music therapy for better growth

Plantation with spiritual music therapy for better growth

अमित दवे/जोधपुर. शास्त्रों में ऐसा उल्लेख है कि मानव जीवन के अस्तित्व में मुख्य भूमिका निभाने वाले पेड़-पौधों में भी प्राण होता है। सुनने में यह बात अजीब लगे, पर सत्य है कि पेड़-पौधे भी गीता, भागवत और हनुमान चालीसा सुनते हैं। इनको भूख-प्यास के साथ दुख, दर्द और खुशी होती है।

जी हां, भीतरी शहर में मेड़ती गेट निवासी रविन्द्र पेड़-पौधों की अपने बच्चों की तरह देखभाल कर रहे हैं और उनको नित्य गीता, भागवत और हनुमान चालीसा का पाठ सुनाते हैं। रविन्द्र काबरा अपनी जिन्दगी बागवानी के शौक के साथ जुनून और शिद्दत के साथ जी रहे हैं।

पेड़-पौधे नित्य सुनते हैं गीता-भागवत
रविन्द्र ने बताया कि वे अपने बगीचे में नित्य 8-10 घंटे काम करते है। सुबह 5 बजे से 11 बजे तक बगीचे में रहते हैं और शाम को 2 घंटे पेड़-पौधों को समय देते हैं। नित्य सुबह पेड़-पौधों को गीता, भागवत, हनुमान चालीसा, राम स्तुति, भजन आदि सुनाते हैं। उन्होंने बताया कि यह वैज्ञानिक दृष्टि से सिद्ध है कि पेड़-पौधों को धार्मिक स्तुति सुनाने से उनमें 20 -25 प्रतिशत तक ज्यादा वृद्धि होती है और ऐसा करने से उनके यहां लगे पौधों में वृद्धि हुई है। साथ ही, इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी होता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि, गुजरात में बड़े-बड़े बगीचों में स्पीकर्स लगे हुए हैं, जहां पेड़-पौधों के लिए नित्य सुबह धार्मिक स्तुति बजती है। इसके अलावा, डेयरी क्षेत्र में गायों के पास संगीत बजाया जाता है, जिससे वे तुलनात्मक रूप से ज्यादा दूध दे रही हैं।

हॉलैण्ड, स्विट्जरलैण्ड की प्रजातियां भी
विश्व में हॉलैण्ड, स्विट्जरलैण्ड और भारत में कश्मीर, गुलमर्ग में पाए जाने वाली दुर्लभ प्रजातियां इनके बगीचे में मिलती है। विभिन्न प्रजातियों के करीब 6 हजार पौधे इनके बगीचे की शान बढ़ा रहे हैं। इनमें कई पौधें तो ऐसे हैं, जो राजस्थान और मारवाड़ की गर्म जलवायु, ऊष्ण वातावरण में पनप ही नहीं सकते, वो भी यहां विकसित है। ठण्ड़े क्षेत्रों, ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाने वाले सहित बहुत ही कम पाए जाने वाली प्रजातियां भी इनके बगीचे में नजर आएंगे।

प्रमुख दुर्लभ प्रजातियां इनके बगीचे में

25 प्रकार के कमल के फूल अलग-अलग रंगों में, ट्यूलिप, लीलियम, आइरिस, हाइड्रेन्जिया, एजेलिया, हेलोकॉर्निया (मछली की तरह होता है ), डेफोडिल्स, ऑर्किड, कारनेशन, डोम्बिया सहित कई देशी-विदेशी प्रजातियां है। इनके अलावा, खुशबू वाले पौधों में स्वर्णचंपा, हरा चम्पा, जूही, चमेली, मोगरा। औषधीय पौधों में दालचीनी , तेजपता, लौंग, पीपरमेंट तुलसी सहित कई प्रजातियां है। ये दुर्लभ व नई प्रजाति के पौधें देश-विदेश से मंगाते है। कई राष्ट्रीय प्रोजेक्ट पर काम कर चुके रविन्द्र वर्तमान में लोगों को निशुल्क बागवानी सिखा रहे है।