
योग-प्राणायाम के निरन्तर अभ्यास से जीत ली विटिलिगो की जंग
-योग-प्राणायाम करने लगे तो कम हो गया विटिलिगो
बासनी (जोधपुर) .
'मेरे शरीर पर सफेद कोढ़ (विटिलिगो) के दाग होने के कारण बचपन में लोग मुझसे घृणा करते थे। हेय दृष्टि से देखते थे। इसको लेकर मैं काफी विचलित होता था। उम्र के साथ समझ बढ़ी तो मैंने आयुर्वेद इलाज के साथ खुद को संभाला। इस पहचान को स्वीकार किया और तनाव छोड़कर योग-प्राणायाम का सहारा लिया। आज मैं स्वस्थ हूं और मैंने इस बीमारी पर नियंत्रण कर लिया।'
बीमारी की जंग को जीतने की यह जुबानी दास्तान है, डॉ. गोपाल नारायण शर्मा की। जिन्हें पिछले 47 साल से विटिलिगो है, लेकिन जब वे आयुर्वेद विभाग की सरकारी सेवा में आए तब से योग-प्राणायाम का सहारा लेते हुए इन्होंने विटिलिगो को न केवल शहीर के अन्य भागों पर बढऩे से रोक दिया, बल्कि इसको काफी कम भी कर दिया। शर्मा 27 साल से बिलाड़ा तहसील के राजकीय आयुर्वेद औषधालय में वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी है।
पांच साल की उम्र में हुआ विटिलिगो
शर्मा ने कहा कि 'पांच साल की उम्र में सफेद दाग उभरे जो हाथों व पैरों पर काफी बढ़ गए। स्कूली शिक्षा पूरी होने तक ये दाग मुंह और गर्दन तक आ गए। लेकिन मैं शुरू से ही एक्टिविटी में आगे रहता था, इसलिए यह बीमारी उन पर हावी नहीं हुई। कई लोग इस बीमारी को छिपाते हैं, लेकिन मैंने इसको सभी को दिखाया और लोगों की इस भ्रांति को भी दूर किया कि यह छूत की बीमारी भी नहीं है।
शादी से पहले खुलकर बताया-
शर्मा ने अपनी शादी होने से पहले ससुराल पक्ष व पत्नी कमलेश को पहले ही बता दिया। उन्होंने साफ कह दिया मेरा शरीर ऐसा है, मैं छिपाना नहीं चाहता। जैसा हूं, वैसा ही दिखा रहा हूं। बाद में किसी को ऐसा नहीं लगे कि ये किसके साथ शादी हो गई।
इसलिए होती है यह बीमारी-
1.मिथ्या आहार का सेवन-
एक दूसरे के विपरित खाद्य पदार्थों का सेवन एक साथ नहीं करना चाहिए। यह शरीर में जाकर जहर का काम करता है। जैसे- दूध के साथ खट्टे पदार्थ, दूध के साथ मछली का सेवन, शहद व घी समान मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए।
2. मानसिक तनाव -
इस बीमारी का होने का बड़ा कारण मानसिक तनाव है। तनाव होने पर यह बीमारी न केवल पैदा होती है बल्कि अधिक तनाव से फैलती भी है। इसलिए शरीर को तनावमुक्त रखना चाहिए।
3. अधारणीय वेग नहीं रोकें-
शरीर में 13 प्रकार के अधारणीय वेग, जिनका धारण नहीं करना चाहिए, उनका तत्काल त्याग कर देना चाहिए। जैसे अपान वायु, मल-मूत्र का वेग, छींक, प्यास, भूख, नींद, खांसी, श्वांस, जम्हाई, आंसू, उल्टी व वीर्य के वेग नहीं रोकना चाहिए।
ऐसे हो सकता है बचाव-
1-दिनचर्या व्यवस्थित रखें।
2-प्रतिदिन अनुलोम-विलोम व कपालभाति का निरन्तर अभ्यास ही इस रोग से बचे रहने और होने पर नियंत्रण करने का सबसे कारगर उपाय है।
3- परहेज- खटाई बिल्कुल भी प्रयोग नहीं करें और नमक का न्यून प्रयोग करें।
4. औषधी- आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी के निर्देशानुसार ही औषधी का सेवन करें।

Published on:
25 Jun 2018 05:11 am
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