
विश्व पर्यावरण दिवस : खेजड़ली घटना के 29 दशक बाद भी पर्यावरण संरक्षण में जुटा है विश्नोई समाज
नंदकिशोर सारस्वत/जोधपुर. आखिर कोई तो कारण रहा होगा हरे वृक्ष खेजड़ी के लिए अमृता देवी विश्नोई के एक आह्वान पर 363 लोगों ने अपनी अमर शहादत की घटना आज भी विश्नोई समाज ही नहीं बल्कि समूचे विश्व को प्रकृति और पर्यावरण बचाने की प्रेरणा दे रहा है। खेजड़ली गांव में चिपको आन्दोलन की प्रणेता अमृतदेवी बिश्नोई तथा उनकी तीन मासूम पुत्रियों आसु,रतनी, भागु ने पेड़ों की रक्षा के लिए पेड़ों से लिपट कर एक आह्वान किया .... सिर साटे रूंख रहे,तो भी सस्तौ जाण। अर्थात पेड़ बचाने के लिए यदि शीश भी कट जाता है तो यह सौदा सस्ता है।
जोधपुर शहर से 28 किलोमीटर दूर खेजड़ली वो धरती है जहां 15वीं सदी में विश्नोई समाज प्रर्वतक गुरु जम्भेश्वर के 29 नियमों की सदाचार प्रेरणा से 363 महिला-पुरुषों ने पर्यावरण संरक्षण को अपना धर्म मानते हुए 290 वर्ष पूर्व सन 1730 में अपने प्राणों का बलिदान किया। मरुभूमि का कल्पवृक्ष कहे जाने वाला खेजड़ी का पेड़ ऐसा है जिसकी पूरा बिश्नोई समाज मातृतुल्या भगवत् स्वरुप की तरह पूजा करता है। कोरोना महामारी सहित सैकड़ों प्राकृतिक आपदाओं के संकट की परिस्थिति में गुरु जम्भेश्वर के वन और वन्यजीवों को संरक्षण देने का संदेश आज भी प्रासंगिक है।
गांव-ढाणियों में अमृतदेवी उपवन- वाटिका महाभियान
प्रकृति संरक्षण को महत्व देने वाले गुरु जम्भेश्वर के बताए 29 नियमों में जीव दया पालणी, रूंख लीलौ नहि घावै और अमृतदेवी का एक नारा सिर सांठै रूंख रहे तौ भी सस्तौ जाण का अनुसरण विश्नोई समाज सदियों से करता आ रहा है। मारवाड़ और राजस्थान के विभिन्न जिलों सहित हरियाणा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश, पंजाब आदि राज्यों में बिश्नोई समाज की विभिन्न संस्थाओं की ओर से खेजड़ली के 363 शहीदों की स्मृति में 220 से ज्यादा अमृता देवी उप वन-वाटिका स्थापित हो चुकी है। इन वाटिकाओं में कम से कम 363 पौधे लगाकर उनकी नियमित देखभाल हो रही है।
सोशल डिस्टेंसिंग के साथ प्रकृति संरक्षण धर्म
विश्व पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर पेड़ों की रक्षार्थ शहीद हुए 363 शहीदों के स्मारक स्थल खेजड़ली में मंहत शंकरदास के सान्निध्य में समाज की महिलाओं, बच्चों एवं युवाओं ने सोशल डिस्टेंसिंग की पालना करते हुए गुरु जम्भेश्वर और माता अमृतादेवी के जयकारों के बीच पेड़ों से लिपटकर पर्यावरण चेतनार्थ सघन पौधरोपण वन्यजीवों के प्रति जन जागरण का संकल्प दोहराया।
पर्यावरण संरक्षण आंदोलन धर्म विशेष का नहीं
पर्यावरण संरक्षण आन्दोलन किसी जाति विशेष या धर्म विशेष का आन्दोलन नहीं है। यह आन्दोलन तो मानव,प्रकृति और संस्कृति की रक्षा व संरक्षण का है। प्रकृति संरक्षण के आंदोलन को नई दिशा देने में राजस्थान पत्रिका के हरयाळो राजस्थान और अमृतं जलम अभियान की अहम भूमिका है।
- रामपाल भवाद, प्रदेशाध्यक्ष बिश्नोई टाईगर्स वन्य एवं पर्यावरण संस्था
Published on:
05 Jun 2020 08:51 am
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