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Holi Special :8 दिनों तक यहां पर मनाई जाती है होली, इसके पीछे की जाने दिलचस्प कहानी

1942 में हुई घटना के बाद लोगों का अंग्रेजों के खिलाफ फूटा गुस्सा, होरियारों के आगे हुक्मरानों को करना पड़ा सरेंडर।

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Holi Special :8 दिनों तक यहां पर मनाई जाती है होली, इसके पीछे की जाने दिलचस्प कहानी

Holi Special :8 दिनों तक यहां पर मनाई जाती है होली, इसके पीछे की जाने दिलचस्प कहानी

कानपुर। मथुरा या वृंदावन में होली का खुमार सिर चढ़कर बोल रहा है। रंग और गुलाल की छटा और फाग गाकर होरियारे धूम मचा रहे हैं। लेकिन कानपुर की होली कुछ अगल है। यहां पर होलिका दहन के से रंग खेलने का जो सिलसिला शुरू होता है, वह करीब एक हफ्ते चलता है। इसके पीछे की कहानी दिलचस्प और आजादी से जुड़ी है। तो आइए जानते हैं कि हटिया की रंगबाजों के उस राज को जिसके बारे में अभी आपने न सुना और न ही जाना होगा।

अंग्रेज अधिकारी की नहीं मानी बात
आजादी से पहले हटिया, शहर का हृदय हुआ करता था। वहां लोहा, कपड़ा और गल्ले का व्यापार होता था। व्यापारियों के यहां आजादी के दीवाने और क्रांतिकारी डेरा जमाते और आंदोलन की रणनीति बनाते थे। यहां के बड़े कारोबारी गुलाब चंद सेठ हटिया के बड़े व्यापारी हुआ करते थे और बड़ी धूमधाम से वहां होली का आयोजन करते थे। वर्ष 1942 में गुनाब चंद के घर के बाहर रंग-गुलाल उड़ रहा था। होली के दिन अंग्रेज अधिकारी घोड़े पर सवार होकर आए और होली बंद करने को कहा। इस पर गुलाब चंद सेठ ने उनको साफ मना कर दिया। अंग्रेज अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

अंग्रेज अफसर के खिलाफ सड़क पर लोग
जब इसकी जानकारी कानपुर के लोगों को हुई तो वह सड़क पर उतर आए। अंग्रेज हुक्मरान ने जागेश्वर त्रिवेदी, पं. मुंशीराम शर्मा सोम, रघुबर दयाल, बालकृष्ण शर्मा नवीन, श्यामलाल गुप्त श्पार्षदश्, बुद्धूलाल मेहरोत्रा और हामिद खां को भी हुकूमत के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार करके सरसैया घाट स्थित जिला कारागार में बंद कर दिया। इनकी गिरफ्तारी से लोगों का गुस्सा और फड़क गया। सबने मिलकर आंदोलन छेड़ दिया और इसमें स्वतंत्रता सेनानी भी जुड़ते चले गए।

घबरा गए थे अंग्रेज हुक्मरान
इतिहासकार मनोज कपूर बताते हैं कि आठ दिन विरोध के बाद अंग्रेज अधिकारी घबरा गए और उन्हें गिरफ्तार लोगों को छोड़ना पड़ा। यह रिहाई अनुराधा नक्षत्र के दिन हुई। होली के बाद अनुराधा नक्षत्र के दिन उनके लिए उत्सव का दिन हो गया और जेल के बाहर भरी संख्या में लोगों ने एकत्र होकर खुशी मनाई। इसी खुशी में हटिया से रंग भरा ठेला निकाला गया और लोगों ने जमकर रंग खेला। शाम को गंगा किनारे सरसैया घाट पर मेला लगा, तब से कानपुर शहर इस परंपरा का निर्वाह कर रहा है।

हटिया से निकला रंगबाजों का ठेला
कभी एक ठेले पर 4 ड्रम और 8-10 लोगों की फाग मंडली के साथ हटिया से निकलने वाला गंगा मेला का कारवां समय के साथ विशाल होता जा रहा है। अब मेला जुलूस में भैंसा ठेले, कई टैंपो-ट्राली, टैक्टर, बैलगाड़ी, शंकर भगवान का रथ, ऊंटों के साथ हजारों लोगों की सहभागिता होती है। हटिया से शुरू हो शहर के विभिन्न स्थानों से गुजरकर इस मेले का समापन वापस हटिया में होता है। हटिया बाजार के कारोबारी विपिन गुप्ता बताते हैं कि गंगा मेला के अवसर पर सभी धर्मो के लोग शामिल होते हैं और आजादी की होली का पर्व धूम-धाम के साथ मनाते हैं।

कौमी एकता का प्रतीक
मूलचंद सेठ बताते हैं कि पहले लोग खूब फाग गाते थे। और जब से गंगा मेला शुरू हुआ तब से तो भले ही होली वाले दिन कम रंग चले लेकिन गंगा मेला शामिल होने सब के सब हटिया पहुंच जाया करते थे। क्या हिंदू क्या मुसलमान तब सब गंगा मेला में इकट्ठा होकर होली खेलते थे। यह परम्परा आज भी जिंदा है। कहते हैं कि कानपुर में कईबार संप्रदासिक दंगे हुए लेकिन गंगामेला आते ही सभी की दूरियां मिट जाती हैं और एक-दूसरे को गले लगाकर देश में अमनचैन के लिए दुआ मांगते हैं।

रंग में आजादी की खुशबू
मूलचंद सेठ बताते हैं कि आजादी के बाद पूरे आठ दिन जमकर होली खेलते थे। अब तो हर गली मुहल्ले के नुक्कड़ पर होली जलाई जाती है, तब किसी एक मैदान में होली जलती थी और होली जलने के दौरान सब अपने अपने घरों निकलकर ऐसे मैदान की ओर जाते थे, जैसे कोई रैली निकलने जा रही हो। होली दहन के वक्त मैदान लोगों से भर जाया करते थे। लेकिन अब होली खेलने के ढंग में परिवर्तन जरूर आया है पर आज भी हटिया के रंगों में आजादी की खुशबू आती है।