
बीजेपी के इन बड़े नेताओं के बीच चल रही रार, अमित शाह ने शीत युद्ध खत्म करने की दी सलाह
कानपुर. कलयुग के चाणक्य अमित शाह तीन लोकसभा उप चुनाव में मिली हार के बाद उत्तर प्रदेश के दौरे पर आए। यहां उन्होंने सरकार और संगठन के अंदर चल रही रार को जाना और उसे दुरूस्त करने की जिम्मेदारी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय को दी। बनारस और आगरा की बैठक में विस्तारकों ने साफ तौर पर राष्ट्रीय अध्यक्ष को बताया कि पिछले छह माह के दौरान सीएम योगी आदित्यनाथ व उनके मंत्रियों के काम-काज पर संगठनमंत्री सुनील बंसल का हस्ताक्षेप बढ़ा है। सरकार व संगठन दो धड़ों में बंट गया है और इसी के चलते पार्टी को तीन चुनावों में हार उठानी पड़ी। बैठक के कानपुर आए एक पदाधिकारी ने बताया कि संगठन मंत्री सरकार बनने के बाद से शासन-प्रशासन पर दबाव बनाकर ट्रांसफर-पोस्टिंग करवाते हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम डॉक्टर दिनेश शर्मा भी उनके सामने सरेंडर किए हैं। अगर ऐसा ही रहा तो पार्टी को बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। अमित शाह ने सीएम व दोनों डिप्टी सीएम से अकेले में बातचीत कर मिशन 2019 की बागडोर पूरी तरह से सीएम योगी आदित्यनाथ के देने का आदेश सुना दिया। इसी के कारण संगठन मंत्री आगरा बैठक के दौरान मंच से दूरी बनाए रहे।
योगी और बंसल में चल रहा शीतयुद्ध
पार्टी अध्यक्ष अमित शाह यूपी दौरे के दौरान विस्तारकों की शिकायत को गंभीरता से लिया और बैठक के दौरान दोनों खेमों को रार खत्म करने की सलाह दी। अमित शाह में संगठन के हाल और सरकार में मंत्रियों की मनमानी से खुश नहीं हैं। परिवहन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह और एकाध अन्य मंत्रियों को छोड़ दें तो बाकि मंत्री अपने फायदे के अलावा संगठन के लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं। शाह ये मानते है कि संगठन के महामंत्री सुनील बंसल भी जीत का भरोसा दिलाने में बार बार असफल हो रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भले ही दिन रात मेहनत कर रहे हों लेकिन योगी भी सत्ता को वोट में बदल नहीं पा रहे हैं। शाह के पास ये भी रिपोर्ट है कि योगी और सुनील बंसल में शीतयुद्ध है। इस शीतयुद्ध के चलते यूपी, कई लॉबी में विभाजित हो चुका है। इसका सबसे बुरा असर पार्टी और कार्यकर्ताओं पर पड़ रहा है। ऐसी भी खबर है कि सुनील बंसल की जगह पार्टी कोई ईमानदार छवि वाला संघ का खांटी नेता ढूंढ रही है जिसके नेतृत्व में संगठन 2019 की तैयारी करे। उधर बंसल की लॉबी कह रही है कि संगठन के स्तर पर कोई कमी नहीं है। कमी अगर है तो योगी के नेतृत्व में है इसलिए उनके विकल्प की तलाश की जानी चाहिए।
मिनी शाह का मिला है तमगा
अमित शाह के लिए सबसे बड़ी दिक़्क़्क़त ये है कि यूपी में सुनील बंसल को नियुक्त करने से लेकर सीएम के लिए योगी के चुनाव में सबसे अहम भूमिका उनकी खुद की थी। उनसे नज़दीकी के कारण, बंसल को तो वैसे भी यूपी में मिनी शाह के नाम से जाना जाता है। लेकिन सच ये है कि शाह की मयान में अब ये दोनों तलवारें आपस में लड़कर शाह के चमचमाते विक्ट्री रेकोर्ड पर ही दाग लगा रही हैं। सूत्रों के मुताबिक जिस तरह के हालात इस वक्त यूपी में है और जिस तरह मोदी की 325 सीटें लाने वाली मेहनत पर पार्टी के नेताओं ने साल भर में ही पानी फेर दिया है उससे खुद पीएम खुश नहीं हैं। सूत्रों की मानें तो अमित शाह जल्द ही पीएम से मिलेंगे और यूपी के फेरबदल को लेकर अंतिम फैसला लेंगे। पार्टी सूत्रों का कहना है की शाह खुद एक अहम बैठक में कह चुके हैं कि यूपी में यही हाल रहा तो बीजेपी लोक सभा 2019 की अंकतालिका में बहुत नीचे खिसक जाएगी। इसलिए 2019 में लौटने के लिए, पार्टी अब यूपी में बड़ा ऑपेरशन करने जा रही है।
इसलिए अमित शाह के खास बने
संगठन मंत्री सुनील बंसल लोकसभा चुनाव के बाद से पिछले चार सालों में वह संगठन के भीतर मजबूती के साथ उभरे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री रह चुके बंसल को लोकसभा चुनाव से पहले संगठन में बड़ी जिम्मेदारी दी गई थी। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ मिलकर बंसल ने 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए यूपी में खास रणनीति के तहत काम किया और बीजेपी तथा उसकी सहयोगी पार्टियों को 80 में से 73 सीटें दिलाने में अहम फैक्टर रहे। एक ओर जहां यूपी विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने प्रशांत किशोर का हाथ थामा, वहीं बंसल ने कार्यकर्ताओं के भरोसे ही यूपी चुनाव लड़ने का फैसला किया। सुनील ने न सिर्फ यूपी में जातीय समीकरणों को बेहद नजदीकी से समझा बल्कि बूथ लेवल तक दलित, ओबीसी और महिलाओं से कार्यकर्ताओं को सीधे तौर पर जुड़ने को कहा। बंसल की इसी रणनीति का नतीजा था कि बीजेपी की यूपी में 2 करोड़ से ज्यादा सदस्यता हुई और विधानसभा चुनाव में पार्टी 325 सीटें जीती।
केशव-बंसल की जोड़ी, अकेले सीएम योगी
विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद संगठन मंत्री सुनील बंसल केशव प्रसाद मौर्या को सीएम बनवाना चाहते थे। इसके लिए वो खुद पीएम मोदी व अमित शाह से मिलकर अपनी बात रखी थी। बंसल ने अमित शाह को तर्क दिया था कि मौर्या पिछड़ी जाति से आते हैं और यूपी में इस वर्ग का बड़ा वोटबैंक हैं। पर आरएसएस के चलते बंसल की नहीं चल पाई और योगी आदित्यनाथ के नाम पर मुंहर पीएम मोदी व अमित शाह ने लगा दी। इसी के चलते शपथ लेने के बाद बंसल और मौर्या सीएम योगी आदित्नाथ से दूरी बना ली। संगटन मंत्री सीएम योगी के निर्णय को अपने बल पर बदलावे और सूबे में अपने मर्जी के अधिकारियों को नियुक्ति कराई। खुद बंसल के कहने पर डिप्टी सीएम केशव मौर्या को कानपुर का प्रभारी मंत्री बनाया गया। जबकि सीएम स्वतंत्रदेव सिंह को यहां का प्रभार देना चाहते थे। भाजपा के एक नेता ने बताया कि इसी के चलते पिछले एक साल से कानपुर के बजाए अन्य जिलों में सीएम ने ज्यादा फोकस किया। साथ ही कानपुर दौरे के दौरान वो एक बार भी मीडिया से रूबरू नहीं हुए।
Published on:
08 Jul 2018 08:57 am
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