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किताबों से मोहब्बत करें, आदत बन जाएंगी

- स्व.शिव नारायण मिश्र स्मृति व्याख्यान- इस बंटती हुई दुनिया में बस किताबें ही जोड़ती हैं- अभिरुचियों से शुरुआत कर चर्चा से प्रेरणा जरूरी- जो कागज पर उतरता है वह परखा हुआ होता है

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कानपुर. किताबें आपसे आपका साक्षात्कार कराती हैं। किताबों से मोहब्बत करें, वे आपकी आदत बन जाएंगी। कानपुर पुस्तक न्यास की पहल पर आयोजित स्व.शिव नारायण मिश्र स्मृति व्याख्यान में वक्ताओं ने कहा कि इस बंटती हुई दुनिया में बस किताबें ही आपस में जोड़ती हैं। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी व प्रसिद्ध लेखक पार्थ सारथी सेन शर्मा ने कहा कि किताबें पढ़ने का समय सबके पास है, बस उसके लिए प्रयास किये जाने चाहिए। समाज में ठहराव की कमी आ गयी है। इससे बस किताबें ही बचा सकती हैं। किताबों में हिसाब-किताब की बात नहीं हो सकती। किताबें आपको सहिष्णु बनाती हैं। उन्होंने कहा कि मानवता के इतिहास में पिछले दो सौ साल खुशकिस्मती वाले हैं। हम खुशकिस्मत हैं कि हम तब पैदा हुए, जब किताबें हैं। प्रिंटिंग प्रेस से पहले साहित्य को हमें याद रखना पड़ता था। अब सूर, तुलसी व कबीर के साहित्य को युवाओं के लिहाज से आसान करना होगा।
वरिष्ठ पत्रकार राज किशोर ने कहा कि अपने आपको पढ़ने के लिए किताबें पढ़नी पड़ती हैं। किताबें ही सबसे अच्छी दोस्त व मार्गदर्शक होती हैं। स्टीफेन हॉकिंस ने साबित किया कि किताबें बोलती हैं। कागज पर जो उतारा जाता है, वह परखा हुआ व विश्वसनीय होता है।

श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अर्जुन अपने ईश्वर से भी सवाल करते हैं और ऐसे तमाम सवालों के सही जवाब किताबें देती हैं। उन्होंने भी किताबों से दोस्ती पर जोर दिया और कहा कि आप किसी किताब को 30-35 पेज पढ़िए, उसके बाद किताबें आपसे स्वयं संवाद करेंगी। इसके लिए अपनी अभिरुचियों के अनुरूप पढ़ना शुरू करें।

कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क से जुड़े रहे विचारक मोहम्मत शादान खान ने कहा कि किताबों ने विकास का पथ प्रशस्त किया है। उन्होंने कहा कि बच्चों को किताबें उपहार में दी जानी चाहिए। किताबें पढ़ने के लिए अनुशासित रहें और अपने लक्ष्य निर्धारित करें। किताबें बेहद व्यक्तिगत अनुभव होती हैं, यह समझना जरूरी है। कानपुर पुस्तक न्यास के संयोजक डॉ.संजीव मिश्र ने कहा कि मौजूदा दौर के साथ सूर-कबीर-तुलसी को भी पढ़ा जाना चाहिए। उन्होंने हर वर्ष 2 जनवरी को स्व.शिव नारायण मिश्र स्मृति व्याख्यान के आयोजन की घोषणा की।

...उसे भी अपने खुदा होने का इतना ही यकीं था-
पार्थ सारथी सेन शर्मा ने ‘कल तक जो तेरी जगह तख्ते नशीं था, उसको भी अपने खुदा होने का इतना ही यकीं था’ पंक्तियों से किताबों की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किताबें एकाधिकार तोड़ती हैं। जब सोच विकसित होती है, तब आपकी स्वीकार्यता भी बढ़ती है। ध्रुवीकरण के दौर में वैचारिक विविधता जरूरी है, इसके लिए ज्यादा से ज्यादा किताबें पढ़नी चाहिए।

...सलीके से कही जाए तो हर बात सुनी जाती है
राज किशोर ने ‘कौन सी बात कहां कैसे कही जाती है, सलीके से कही जाए तो हर बात सुनी जाती है’ पंक्तियों से किताबों से सभ्य समाज का सलीका प्राप्त होने की बात कही। टीवी पर मचने वाले हल्ले पर ‘कहीं से ढूंढ़ कर लाओ वह दिमाग, दो खुशामद आदतन नहीं करता’ पंक्तियों के साथ कहा कि तर्क व तथ्य रखने वाले चीखते-चिल्लाते नहीं हैं। इसलिए ज्यादा पढ़े, क्योंकि अच्छा पढ़ेगे तो अच्छा सुनेंगे।

किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से...
मोहम्मद शादान खान ने गुलजार की पंक्तियों ‘किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से, बड़ी हसरत से तकती हैं महीनों अब मुलाकात नहीं होती’ से किताबों की मजबूरी बयां की तो मीर तकी मीर की पंक्तियों ’यही जाना है कि कुछ न जाना हमने, वो भी एक उम्र में हुआ है मालूम’ से किताबों की जरूरत पर जोर दिया। कहा कि किताबें टाइम मशीन की तरह हैं जो हमें यात्राएं कराती हैं।

इन किताबों से करें शुरुआत-
वक्ताओं ने जार्ज ऑरवेल की एनिमल फार्म, हरिशंकर परसाई की किसी भी पुस्तक, सेपियंस, फ्रीडम एट मिडनाइट, राग दरबारी, रवींद्र नाथ टैगोर की गोरा, प्रेमचंद्र की लघु कहानियों के संग्रह मान सरोवर, राजगोपाला चारी की महाभारत व रामायण के साथ मंटो व शरद जोशी की किताबों से शुरुआत करने को कहा।