27 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

ई देशी रेडियो स्टेशन मा समाय रही दुनिया

कानपुर देहात के एक अति पिछडे गांव में एक कम्युनिटी रेडियो स्टेशन खास आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है।

2 min read
Google source verification

image

Abhishek Gupta

Apr 15, 2016

Radio

Radio

कानपुर.
जहां आज के दौर में टीवी और रेडियो व एफएम हाईटेक हैं, नए-नए
तरीके से प्रोग्रामों का प्रसारण कर लाखों रुपए कमा रहे हैं, वहीं इंटरनेट
और एफएम चैनलों के इस दौर में कानपुर देहात के एक अति पिछडे गांव में एक
कम्युनिटी रेडियो स्टेशन खास आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। यह देशी रेडियो
स्टेशन गांव और ग्रामीणों की छोटी छोटी समस्याओं से लेकर सरकार के बडे
बड़े फैसलों तक की जानकारी घर घर तक पहुचां रहा है।


दूसरे रेडियो स्टेशनो की
अपेक्षा इस देशी रेडियो स्टेशन में इंग्लिश नहीं सुनने को मिलती, बल्कि
यहां के आरजे ठेट देहाती अंदाज में लोगों से मुखातिब होते हैं और देहाती
अंदाज में ग्रामीणों की समस्याओं के लिए समाधान बताते हैं। इसकी विशेष बात
एक यह भी कि इसे संचालित करने वाली एक महिला है। ठेट देहाती अंदाज में माइक
पर बोलता युवक, ढोल बजाकर थाप पर गाना गाता नेत्रहीन और बीहड गांव में बनी
इस इमारत पर लिखा देशी बाजा ये तस्वीर है कानपुर देहात के मैथा ब्लॉक के
बैरी गांव के रेडियो स्टेशन की।


अब इस बैरी गांव की पहचान बदल चुकी है।
क्योंकि यहां एक देशी रेडियो एफएम खुल चुका है। जो ग्रामीणों के बीच खासा
आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। इस रेडियो एफएम का नाम 'वक्त की आवाज' है।
ये एफएम महज दो साल पहले शुरू हुआ लेकिन आज अनगिनत घरों तक इसकी पहुंच हो
गयी है। लोगों को घर बैठे तमाम ऐसी जानकारी मिल रही हैं जो रोजमर्रा के लिए
बहुत जरूरी हैं।


देसी एफएम की हर खबर रहती है अनोखी

कन्या भ्रूण हत्या, दूषित पानी से होने वाली बीमारियां और घरेलू हिंसा जैसे
मामलों को इस देशी रेडियो स्टेशन ने सिलसिले वार चलाया, घर की लुटिया खेत न
जई जैसे कार्यक्रम को ग्रामीण श्रोताओं पर बड़ी छाप छोडी है। ढोलक बजाता
गोलू दुनिया देख नहीं सकता लेकिन इसी रेडियो स्टेशन के माध्यम से इसने गाना
बजाना सीखा है। और आज अपने इस हुनर से लोगों को जागरुक करता है।



सुमित देशी बाजा का आरजे


आरजे सुमित की माने तो उनका उददेश्य पैसा कमाना नहीं बल्कि लोगों को जागरुक
करना है। एंकरिंग के दौरान सुमित खड़ी बोली की जगह गांव की ठेट देहाती
भाषा को अहमियत देते हैं जिससे ग्रामीणों का लगाव बढता है। इस रेडियो
स्टेशन की संचालिका राधा शुक्ला की माने तो 28 अगस्त 2012 से इस रेडियो का
प्रसारण शुरू हो गया था। पहला साल ट्रायल का था। शुरूआत में लोग जुड़ने से
हिचके, बात करने पर मूल विषय से ज्यादा लोग बिजली और पानी के मसले उठाते
रहे।अब रेडियो की मंशा लोग जान चुके हैं। सकारात्मक सहयोग मिल रहा
है।महिलाएं खुल कर बात करती हैं। मौजूदा फ्रेक्युएन्सी 15 किलो मीटर है। इस
दायरे में आने वाले सभी गांव में इसका प्रसारण चल रहा है। हालांकि
मेट्रो सिटीज की तरह इस देशी रेडियो स्टेशन में संसाधन नहीं है। बावजूद
इसके ये रेडियो स्टेशन किसी शहरी रेडियो एफएम से कम नहीं है।