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कन्या भ्रूण हत्या, दूषित पानी से होने वाली बीमारियां और घरेलू हिंसा जैसे
मामलों को इस देशी रेडियो स्टेशन ने सिलसिले वार चलाया, घर की लुटिया खेत न
जई जैसे कार्यक्रम को ग्रामीण श्रोताओं पर बड़ी छाप छोडी है। ढोलक बजाता
गोलू दुनिया देख नहीं सकता लेकिन इसी रेडियो स्टेशन के माध्यम से इसने गाना
बजाना सीखा है। और आज अपने इस हुनर से लोगों को जागरुक करता है।
सुमित देशी बाजा का आरजे
आरजे सुमित की माने तो उनका उददेश्य पैसा कमाना नहीं बल्कि लोगों को जागरुक
करना है। एंकरिंग के दौरान सुमित खड़ी बोली की जगह गांव की ठेट देहाती
भाषा को अहमियत देते हैं जिससे ग्रामीणों का लगाव बढता है। इस रेडियो
स्टेशन की संचालिका राधा शुक्ला की माने तो 28 अगस्त 2012 से इस रेडियो का
प्रसारण शुरू हो गया था। पहला साल ट्रायल का था। शुरूआत में लोग जुड़ने से
हिचके, बात करने पर मूल विषय से ज्यादा लोग बिजली और पानी के मसले उठाते
रहे।अब रेडियो की मंशा लोग जान चुके हैं। सकारात्मक सहयोग मिल रहा
है।महिलाएं खुल कर बात करती हैं। मौजूदा फ्रेक्युएन्सी 15 किलो मीटर है। इस
दायरे में आने वाले सभी गांव में इसका प्रसारण चल रहा है। हालांकि
मेट्रो सिटीज की तरह इस देशी रेडियो स्टेशन में संसाधन नहीं है। बावजूद
इसके ये रेडियो स्टेशन किसी शहरी रेडियो एफएम से कम नहीं है।
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