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7 बार के विधायक की बैलगाड़ी थी सवारी, बेनी बाबू के परिजन करते हैं मजदूरी

1948 के बेनीसिंह पहली बार मनोनीत सांसद बने और 1952 में यूपी के पहले विधानसभा सदस्य चुने के बेनीसिंह गांव के छह लोगों के बैलगाड़ी में बिठाकर लखनऊ ले गए और उन्हें वहां की सैर कराई, पर परिवार को राजनीति से दूर रखा, अपना नहीं गरीबों का विकास किया।

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7 बार के विधायक की बैलगाड़ी थी सवारी, बेनी बाबू के परिजन करते हैं मजदूरी

कानपुर। आज के दौर में राजनीति में रईस अरैर रसूखदार नेताओं का दबदबा है। सरपंच से लेकर संसद बनते ही वो लग्जरी कारों में चलने लगते हैं। समाज के बजाए अपना व अपने घर का विकास करते हैं, पर कुछ ऐसा राजनेता भी हुए, जिन्होंने पूरी जिंदगी करीबी की सेवा कर अपनी तिजारी भरी। खुद व परिवार का पेट भरने के बजाए गरीब की थाली पर रोटी परोसी। हम आपको ऐसे ही इमानदार नेता के बारे में आपको रूबरू कराने जा रहे हैं, जो सात बार विधायक रहे पर उनके परिजन मजदूरी के जरिए अपना पेट पाल रहे हैं। कानपुर के दोआब सीट घाटमपुर जिसे लोग गेट ऑफ बुंदेलखंड के नाम से पुकारते हैं। यहीं के बिरसिंहपुर गांव निवासी पूर्व विधायक बेनीसिंह अवस्थी, जो जनप्रतिनिधि बनने के बाद अपनी सादगी से समझौता नहीं किया। विधानसभा जाने के लिए वो गांव के मित्र की बैलगाड़ी लेते और किसानों को बैठाकर लखनऊ की सैर कराया करते थे।

कौन है बेनीसिंह
भीतरगांव ब्लॉक के बिरसिंहपुर निवासी स्व पुतिया सिंह के घर में 1907 में बेनीसिंह का जन्म हुआ। वह गणेश शंकर विद्यार्थी और पंडित चन्द्रशेखर के बहुत करीबी थे। वह कांग्रेस के गरम गुट के सदस्य थे और अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया और जेल भी गए। आजादी के बाद बाबू जी मनोनीत सांसद 1948 में चुने गए। चार साल के इन्हें यूपी का पहला मनोनीत सदस्य बनाए गए। 1952 में यूपी के पहले विधानसभा सदस्य चुने गए। चुनाव जीतने के बाद बेनीसिंह गांव के छह लोगों के बैलगाड़ी में बिठाकर लखनऊ ले गए और उन्हें वहां की सैर कराई। बेनीसिंह तीन बार विधायक और एक बार मंत्री के साथ राजपाल के खाद्य सलाहकार रहे। गांव वाले उन्हें बड़े बाबू जी के नाम से पुकारते थे। बाबू जी परिवार को कभी राजनीति में नहीं लाए। इसके साथ ही उनके परिवार के किसी सदस़्य के पास चार पहिया तो छोड़िए बाइक भी नहीं है। उनका पूरा परिवार गांव में रहता है और कृषि के अलावा मजूदरी करके अपना गुजर बसर करता है।

बैलगाड़ी के बल पर जीता 1967 का चुनाव
बेनी बाबू के पोते वैभव अवस्थी ने बताया कि दादा ने 1966 में पुरानी बैलगाड़ी को गांव के ही किसान को देकर नई बैलगाड़ी बनवाई। 1967 के विधानसभा चुनाव के दौरान वह नई बैलगाड़ी से प्रचार के लिए निकल जाया करते थे। बैलगाड़ी में उनके साथ पांच छह लोग रहते थे और वह पूरे दिन लोगों से मिलकर वोट मांगते थे। वह महज पांच घंटे ही सोते थे। बाबू जी ने कभी बैल बाजार से नहीं खरीदे, उन्हें गाय रखने का बहुत शौक था और उन्हीं के बछड़े तैयार करते थे। चुनाव जीतने के बाद बाबू जी बैलगाड़ी से लखनऊ कई बार गए। इतना ही नहीं बाबू जी के साथ पूर्व सीएम कमलापति त्रिपाठी को लेकर गांव भी आए थे।

कमलापति से थी गहरी दोस्ती
वैभव के मुताबिक बाबू जी के वैसे तो हर नेताओं से अच्छे संबंध थे, लेकिन पूर्व सीएम कमलापति से उनकी गहरी मित्रता थी।स्वतंत्रता सेनानी मानसिंह बताते हैं कि सीएम साहब ने बाबू जी को कार खरीदने के लिए पैसे दिए लेकिन उन्होंने लेने से इंकार कर दिया और कहा कि अगर सच में पैसा देना चाहते हैं तो सजेती गांव के लोगों को दें। इस पैसे से गांव में नहर आ सकती है जिससे एक नहीं कई गांवों के किसानों का फाएदा हो सकता है। सीएम के आदेश पर महज दो माह में सजेती के आसपास के गांव तक नहर आ गई। मानसिंह बताते हैं कि बाबू जी की कार्यशैली से प्रभावित होकर दूसरे दलों के नेता भी कायल थे। 1976 में हृदयगति रुकने से बाबू जी का निधन हो गया। उनके अंतिम संस्कार में यूपी के तत्कालीन मंत्री कमलापति त्रिपाठी के साथ बड़े-बड़े नेता गांव में आकर शव यात्रा में शामिल हुए थे। पूरा कैबिनेट गांव में दाहसंस्कार के दौरान मौजूद रहा था।

पौत्र को गांव वालों ने चुना था सरपंच
बाबू सिंह जब तक इस दुनिया में रहे अपने परिवार को राजनीति से दूर रखा। वह वंशवाद के धुर विरोधी थे लेकिन उनके निधन के बाद लगभग पांच हजार की आबादी के गांव के लोगों ने उनके पौत्र वैभव अवस्थी को चुनाव लड़ने के लिए कहा।वैभव ने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। गांव वालों के बहुत मनाने के बाद बाबू जी के परिवार का कोई सदस्य देश की पहली संसद ग्रामपंचायत का चुनाव 2010 में निर्विरोध जीता। वैभव बताते हैं कि बाबू जी नेता नहीं थे वह क्रांतिकारी थे। उनके सामने अगर गरीब, मजलूम आ जाता था तो खाने की थाली छोड़कर पहले उसका काम करवाते थे।