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कानपुर

वैज्ञानिक सबूतों ने दिव्या के कातिल को भेजा जेल

8 साल पहले स्कूल में छात्रा को उतारा गया था मौत के घाट, कोर्ट ने एक को सुनाई उम्रकैद तो मामले में अन्य दो अभियुक्तों को एक.एक साल कैद की सजा सुनाई गई है। वहीं मुख्य अभियुक्त के पिता को बरी कर दिया है।

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कानपुर। चर्चित दिव्या हत्याकांड में बुधवार को फैसला आ गया है। लगभग सवा आठ साल यानि 2990 दिन का संघर्ष, दिव्या की मां और उसके दोस्तों की आंखों का इंतजार रंग लाया और मृतका की मां का न्याय मिला। इस मामले में कोर्ट ने मुख्य अभियुक्त पीयूष को उम्रकैद के साथ 75 हजार का अर्थदंड और उसके भाई मुकेश को एक साल का कारावास की सजा सुनाई। जबकि कोर्ट ने इस वारदात में दो दोषी बनाए गए आरोपियों को एक साल की सजा दी। पर कानपुर के लिए ये पहला केस बना, जहां गवाहों के जरिए नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सबूतों के जरिए अभियुक्तों को सजा मिली।

क्या थे वैज्ञानिक सबूत
अधिकतर मामलों पर न्यायालय गवाहों के जरिए अभियुक्तों को दोषी मानते हुए सजा देती है, लेकिन दिब्यां केस में ऐसा नहीं हुआ। सीबीसीआईडी ने गवाहों के बजाए वैज्ञानिक तर्को को चार्जशीट में जगह दी। इनमें से डीएनए, स्मर्म रिपोर्ट और चीफ मेडिकोलीगल रिपोर्ट ने केस की पूरी दिशा बदल कर रख दी। दिब्यां हत्याकांड में सीबीसीआईटी के पास एक भी चश्मदीह नहीं थे। सीबीसीआईडी के पास सबसे बड़ी चुनौती थी कि घटना को सबूतों के अधार पर कड़ी पद कड़ी जोड़ना था। सीबीसीआईडी ने 9 नवंबर 2011 में मुकेश, पियूष, और चंद्रपाल के खून का सैंपल लिया। इसे हैदराबाद जांच के लिए भेज गया। 2012 में रिपोर्ट आई और जांच एजेंसी के हाथ सपूत लग गए।

2990 दिन बाद मिला इंसाफ
आठ साल पहले 27 सितंबर 2010 में दिव्या के साथ उसके ही स्कूल में दरिंदगी के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी। इस घटना से आहत दिव्या की मां न्याय के मंदिर से इंसाफ की आस लगाए बैठी थी। समाज को झकझोर देने वाले कांड में 8 साल दो महीने बाद कोर्ट ने फैसला सुनाया। लगभग सवा आठ साल यानि 2990 दिन का संघर्ष, दिव्या की मां और उसके दोस्तों की आंखों का इंतजार रंग लाया। 125 पेज के कोर्ट फैसले का मजबूत आधार डीएनए टेस्ट रिपोर्ट रही। एडीजे दो न्यायाधीश ज्योति कुमार त्रिपाठी ने बुधवार को दोनों पक्षों की जिरह व बहस के बाद रावतपुर के गणेशनगर निवासी पीयूष को कुकर्म व हत्या का दोषी करार देते हुए सजा सुनाई। सह अभियुक्त पीयूष के भाई सुधीर उर्फ मुकेश वर्मा व भारती ज्ञान स्थली स्कूल के कर्मचारी संतोष कुमार उर्फ मिश्राजी को एक-एक साल की सजा दी। पीयूष पर 75 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया।

इस स्कूल में पढ़ती थी दिव्या
दिव्या उर्फ अनुष्का रावतपुर स्थित भारती ज्ञान स्थली स्कूल में कक्षा 6 में पढ़ती थी। सोनू ने रिपोर्ट लिखाई थी कि 27 सितंबर 2010 को वह बेटी को सुबह 7ः30 बजे स्कूल छोड़कर आ गई थी। स्कूल में अचानक उसकी हालत गंभीर हो गई। आया परवीन, माया और कर्मचारी संतोष कुमार दिव्या को घर के बाहर लहूलुहान हालत में तबीयत खराब होने की बात कहकर छोड़ दे गए। जब वह आई उसके होश उड़ गए। आनन-फानन में पड़ोसियों की मदद से दिव्या को शारदानगर स्थित अनुराग हॉस्पिटल ले गए। यहां डॉक्टर ने जवाब दे दिया तो विजयनगर स्थित छपेड़ा पुलिया के अस्पताल ले गए, यहां भी जवाब मिलने पर हैलट ले जाया गया, आखिरकार हैलट में दिव्या को मृत घोषित कर दिया गया। डॉक्टरों ने कहा था कि अधिक रक्तस्राव के कारण उसकी जान गई।

आनन-फानन में दर्ज किया था मुकदमा
सोनू ने स्कूल में बेटी के साथ दरिंदगी का आरोप लगाया था। जांच कर रही पुलिस ने मामले को रफा-दफा करने को कहानी बनानी शुरू कर दी। मामला तूल पकड़ने पर पुलिस ने स्कूल के प्रबंधक चंद्रपाल और उसके बेटे सुधीर वर्मा व मुकेश को गिरफ्तार कर लिया। शहर आंदोलित हो गया तो दिव्या के घर के सामने रहने वाले एक बिस्कुट फैक्ट्री के कर्मचारी व रिक्शा चालक मुन्ना और पीयूष की गिरफ्तारी हुई। पोस्टमार्टम में कुकर्म निकलने पर जांच सीबीसीआईडी को दी गई। सीबीसीआईडी की रिपोर्ट के बाद मुन्ना को रिहा कर दिया गया। इस मामले में पीयूष की जमानत अभी तक नहीं हो पाई थी। बुधवार को फैसले के बाद पीयूष को पुलिस हिरासत में जेल भेज दिया गया।

फांसी के लिए फिर करूंगी अपील
दिव्या को इंसाफ मिलने के बाद सोनू ने मुख्य अभियुक्त को सजा मिलने पर न्याय की बात कही पर अन्य अभियुक्तों को कम सजा मिलने पर वह नाखुश रही। बकौल सोनू, इसके लिए अब हाईकोर्ट में अपील दाखिल करूंगी। अदालत पहुंची सोनू फफककर रो पड़ी। उनका कहना है कि उसकी बेटी वापस नहीं मिलेगी। आठ साल के संघर्ष के बाद न्याय मिला है। बाकी लोगों को भी कड़ी सजा मिलनी चाहिए थी। मां सोनू सिंह ने कहा कि जहां शहर के लोग मेरे साथ रहे, वहीं वकील अजय भदौरिया ने पूरा मुकदमा बिना पैसे लिए लड़ा। सोनू सिंह ने कहा कि मुझे अभी पूरा न्याय नहीं मिला। क्योंकि पियूष को मैं हरहाल में फांसी के फंदे पर झूलते देखना चाहती थी। मैं अब इसके खिलाफ हाईकोर्ट जाऊंगी।