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शाहपुर की रानी के इस किले के कुएं में दफन है अंग्रेजों की लाशें

इस देश में राजाओं का इतिहास प्राचीन काल से रहा है। जो आज भी लोग इतिहास में पढ़ा करते है और उनकी दास्तां को बयां करते है

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Ruchi Sharma

Aug 23, 2016

kanpur

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कानपुर देहात. इस देश में राजाओं का इतिहास प्राचीन काल से रहा है। जो आज भी लोग इतिहास में पढ़ा करते है और उनकी दास्तां को बयां करते है। राजाओं के इतिहास से ही जुडे अंग्रेजों की क्रूरता का परिचय भी पीछे नहीं है। जनपद कानपुर देहात के कई स्थानों पर अगर राजाओं, क्रांतिकारियों का खून बलिदान हुआ है, तो फिरंगियों के आतंक का भी इतिहास इसी मिट्टी में कहीं न कहीं दफन हुआ है।

जिनमें से कुछ का इतिहास पन्नों पर उल्लिखित है और कुछ गुमनाम हो चुके है। स्वतंत्रता संग्राम की जंग छिड़ने पर सभी राजाओं व रानियों ने अपने हाथों में तलवार उठाकर जंग में कूद पड़े थे। उस दौरान राजाओं और प्रजा में कोई अंतर नहीं था। सभी देश के लिये मिटने को तैयार थे। उस समय में राजाओं के किले व हवेलियां आज भी जनपद के तमाम स्थानों पर कहानी गढ़ रहे है। लेकिन उनकी देखरेख के लिये कोई नहीं है। ऐसा ही अकबरपुर के शाहपुर में रानी का किला, जो आज भी अंग्रेजों की लाशे दफन किये है।

1857 के संग्राम का हिस्सा है ये किला

जनपद के अकबरपुर स्थित शाहपुर की रानी का किला 1857 में शुरू हुए स्वतंत्रता संग्राम की याद दिलाता है। क्रांति के समय यह किला क्षेत्र में विख्यात का एक पर्याय बना हुआ था। किले की चाहर दीवारी पर चमकती रोशनी अकबरपुर के दस दस कोशो दूर दिखाई देती थी। जो अन्य राजाओं के नाक का बाल बनी हुयी थी। बाढापुर के राजा विजय सिंह ने अपनी रानी के आरामगाह के रूप में बनवाया था। रानी ये चाहती थी कि उन्हे अपना साम्राज्य अपने किले से ही दिखाई दें। किले में एक विशाल कुआं बनवाया गया था। जिसमें चार दासियां नियुक्त की गयी थी, जो रानी के स्नान के समय उनकी सेवा में तत्पर थी। किले के पास से गुजरने वाले प्रत्येक राहगीर के लिये रानी ने प्याऊ सेवा कर रखी थी। राजा विजय सिंह के नाना राव पेशवा से घरेलू सम्बंध थे। जो अक्सर उनके यहां आकर विश्राम ग्रह में रुकते थे। अंग्रेजों के खिलाफ आज़ादी जंग शुरू हुयी।

बाढापुर के इस राजा ने धूल चटाई फिरंगियों को

आजादी के प्रेमियों के लिये विजय सिंह का किला आज भी पर्यटन का केंद्र बना हुआ है। बताया गया जनवरी 1858 में अंग्रेजों ने नाना साहब पेशवा को पकड़ने के लिये 10 हजार का इनाम रखा था। नाना साहब पेशवा को जानकारी लगते ही नाना साहब अपने साथियों के साथ बिठूर से निकलकर राजा विजयसिंह के किले में अतिथि के रूप में आकर रुक गये। नाना साहब को पकड़ने के लिये अंग्रेजों की सेना आ रही है, इसकी खबर जैसे ही राजा विजय सिंह को मिली। राजा के आदेश पर उनकी सेना ने किले के उत्तर दिशा को किलेबंद कर दिया।

जैसे ही अंग्रेजी फौज सामने से आती दिखी, तो राजा की सेना ने हमला बोल दिया। और करीब 30 घंटे की जंग के बाद सेना ने अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया। और लाशों के किले के कुएं में दफन करा दिया। जिसके बाद उस कुएं को पटवा दिया था। बाद में अंग्रेजी सेना ने रानी के इस किले को ध्वस्त कर तहसील व कोतवाली शुरू की थी। सन् 1998 तक तहसील का संचालन होता रहा है।

गुराना खेत के नाम से आज भी चर्चित है वह स्थान

राजा विजय सिंह को भली भांति मालूम था, कि अंग्रेजी सेना के सिपाहियों की मौत की खबर जैसे ही अंग्रेजी अफसरों को मिलेगी। वह दोबारा से हमला करेंगे। इसलिये राजा ने सेना को पूरे किले की सुरक्षा में लगा दिया और मारे गये अंग्रेजी सेना के सिपाहियों को कुएं में डलवाकर कुएं को ऊपर से पटवा दिया था। वर्तमान मे वह कुआं एक खेत के रूप में तब्दील हो गया है। जिसे गुराना खेत के नाम से जाना जाता है। जहां अब लोग खेती का कार्य करते है। लेकिन ध्वस्त पडे उस किले को देख आज भी लोग स्वतंत्रता के उन दिनों को याद करते है।