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इस आश्रम पर रहनुमा बनकर प्रकृति भी बरसाती है अपनी कृपा

इस देश में मस्जिदों, मंदिरों, चर्च व गिरिजाघरों की आस्था को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं सुनने में आती है

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अरविंद वर्मा

कानपुर देहात. इस देश में मस्जिदों, मंदिरों, चर्च व गिरिजाघरों की आस्था को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं सुनने में आती है। कहीं मूर्ति स्थापना तो कहीं देवों का वास होना ऐसी मान्यताओं के चलते लोगों का सैलाब उन स्थानों पर उमड़ता है। ऐसे ही तमाम मंदिरों का किस्सा इतिहास में दर्ज है, लेकिन इनके अतिरिक्त ऐसे भी बहुत मंदिर है, जिनका इतिहास व पुराणों में नाम दर्ज तो नहीं है लेकिन वे मन्दिर नाम और पहचान के मोहताज भी नहीं है। उनका महत्व और उन मंदिरों के प्रति लोगों की आस्था आज भी बढ़ती ही जा रही है। विशाल व भव्य मेले में जाकर लोग मंदिर में विराजमान देवी देवताओं की आराधना कर मेले का लुत्फ उठाते है। वहीं मंदिर से वास करने वाले देवी देवताओं का विधि विधान से पूजन करते है।

ऐसा ही जिले के तिश्ती में स्थित धनेश्वर मंदिर है, जिसकी महिमा अपरम्पार है। इस आश्रम की कहानी अद्भुत है, जिसका महिमा मंडन करते लोग नहीं थकते है। तहसील रसूलाबाद क्षेत्र के तिस्ती के मुर्रा ग्राम पंचायत के समीप स्थित यह आश्रम दिनों दिन अपनी कीर्ति की पताका फहरा रहा है, जो लोगों के लिए एक आस्था का प्रतीक बनता जा रहा है।

क्या है इसकी पूरी कहानी

बताया जाता है कि बहुत समय पूर्व यहां पर एक संत अचानक आये और उन्होंने वहीं बगल के गांव वालों से उस स्थान पर रहने के लिए अनुमति मांगी। जिस पर वहां के सरपंच ने ग्रामीणों की सहमति से हामी भर दी। जिसके बाद ग्रामीणों ने उन महान संत का भरपूर सहयोग किया। जिससे उन्होने वहीं अपना आश्रम बना लिया और शिवशंकर की आराधना करने लगे। इसके अतिरिक्त यहां कई मंदिर हैं और नन्दी बाबा आश्रम की शोभा बढ़ा रहे है। जिसे धनेश्वर आश्रम नाम दिया गया। क्षेत्र के पूर्वजों का मानना था कि उन महान संत को कभी किसी ने सोते हुए नहीं पाया और रात दिन भजन में लगे रहते थे। उनके भजन के प्रभाव से पूरे क्षेत्र में कभी भी किसी प्रकार की ओलावृष्टि, आकाशीय बिजली आपदा जैसी अनहोनी नहीं हुई। उनकी आराधना के प्रभाव को देख उनके मुरीद बन गये।

कई पीढ़ियां बदल गयी लेकिन आस्था नहीं

उन्होंने वंदना में लगे रहते हुये सतानन्द को अपना शिष्य बना लिया। जिसके बाद वह किसी को बिना बताए आश्रम छोड़कर कहीं चले गए। लोगों ने उनकी काफी तलाश की, लेकिन खोजबीन के बाद भी उनका पता नहीं चल सका। इसके बाद सतानन्द ने भी उनके पदचिन्हों पर चलकर पूजा-पाठ कर अपने गुरु का मान रखा।

धीरे-धीरे लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होंनें से भक्तों की आस्था बढ़ने लगी। तो आश्रम की तरफ कारवां बढ़ता ही चला गया। इसके बाद राधे बाबा नाम के सन्त ने कार्यभार संभाल लिया। देखते ही देखते धनेश्वर आश्रम की ख्याति बढ़ती ही चली गई। उनके बाद अब आनन्दा जी सरस्वती की देखरेख में कार्यक्रम किया जा रहा है।

इस आश्रम की खास विशेषताएं

यहां पर खुदाई करने पर एक पुरानी दीवाल मिली और सैकड़ों वर्ष पुराना एक ऐसा पेड़ आज भी है, जिसमे एक काला सर्प बामी (बिल) बनाकर रह रहा है। जो कभी भी आंधी तूफान में नहीं गिरा और न ही आज तक सूखा है। कई पीढ़ियों से लोग कुदरत की इस नियामत को देखते चले आये। जब उस पेड़ का तना सूखता है तो उसी से नया पेड़ निकल आता है। इसके अतिरिक्त भी यहां पर कई प्रकार के वृक्ष होने के कारण इसे पंचवटी भी कहते है। समय-समय पर यहां बहुत भव्य मेला भी लगता है।