
समलबाई से इतना खतरा क्यों? आखिर इंसान को अंधा कैसे करती है
कानपुर। ४० साल की उम्र के बाद ज्यादातर लोगों की आंखों में समलबाई का खतरा बढ़ जाता है। समलबाई या ग्लूकोमा आंखों की ऐसी गंभीर बीमारी है। यह बिना किसी दर्द या खास लक्षण के चुपके-चुपके आंखों की रोशनी चुरा लेती है। सही इलाज के अभाव आंखों की नसें खराब होने लगती हैं, जिससे नजर कमजोर होने लगती हैं। लापरवाही से आंखों की रोशनी तक जा सकती है। इस बीमारी को काला मोतिया भी कहा जाता है। हर रोगी को ४० साल बाद आंखों की जांच कराते रहना चाहिए। यह बात अंतराष्ट्रीय एकॉइन कॉन्फ्रेंस के अंतिम दिन नेत्र विशेषज्ञों ने बताई।
सूख जाती है आंख की आई मैसेंजर नर्व
कॉन्फ्रेंस में नेत्र विशेषज्ञों ने बताया कि इस रोग से आंख की रोशनी अगर गई तो फिर नहीं लौटती। इसमें आंख का प्रेशर बढ़ जाता है, जिससे आई मैसेंजर कही जाने वाली नस ऑप्टिक नर्व सूख जाती है। इस नर्व का काम आंख का मैसेज दिमाग तक पहुंचाना होता है। तभी व्यक्ति देख पाता है। विशेषज्ञों के अनुसार कुल अंधेपन में से छह से सात फीसद की वजह समलबाई है। ओपीडी में पहुंचने वाले कुल मरीजों में करीब 20 फीसद समलबाई के होते हैं।
दो तरह की होती समलबाई
समलबाई की बीमारी दो तरह की होती है। पहले को शांत कालामोतिया कहते हैं। यह 40 से 70 साल उम्र के लोगों में देखा जाता है। यह रोग वंशानुगत होता है और अक्सर दोनों आंखों को एक साथ प्रभावित करता है। बीमारी के दूसरे प्रकार में मरीज की आंख सूजन के साथ लाल हो जाती है। आंखों व सिर में तेज दर्द होता है। इससे आंखों की रोशनी कुछ मिनटों में अचानक गिर जाती है। बाद में वापस आती हैं लेकिन नजर पहले से कमजोर हो जाती है। हर अटैक के साथ नजर कमजोर होती चली जाती है।
इस तरह के आईड्रॉप से बचें
बताया गया कि जिन लोगों के चश्मे का नंबर अधिक है उन्हें स्टेरॉयल युक्त आई ड्रॉप का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए या फिर डॉक्टर की सलाह पर ही करना चाहिए। इस तरह के आई ड्रॉप का ज्यादा इस्तेमाल करने पर यह समस्या हो सकती है। वरिष्ठ नेत्ररोग विशेषज्ञ डॉ. अवध दुबे ने जानकारी दी है कि जनजागरण अभियान में तेजी लाने का निर्णय लिया गया है।
Published on:
21 Oct 2019 11:49 am
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