
बिकरू कांड पर खुशी दुबे का दर्दनाक खुलासा Source- X
Bikru Kand Accused Khushi Dubey: बिकरू कांड में मुख्य अभियुक्तों में शामिल खुशी दुबे ने पुलिस के साथ हुए व्यवहार और अपनी पीड़ा के बारे में विस्तार से बयान दिया है। यह बयान मुख्य रूप से एक इंटरव्यू वीडियो में सामने आया है, जहां वह खुद को निर्दोष बताती हैं और पुलिस पर अत्याचार के आरोप लगाती हैं। खुशी उस समय नाबालिग 16 से 17 साल की थीं और शादी के सिर्फ 3 दिन बाद ही इस मामले में फंस गईं।
खुशी दुबे की शादी अमर दुबे से 29 जून 2020 को हुई थी। शादी की रात देर तक चली। महज 3 दिन बाद, 2-3 जुलाई की रात को बिकरू गांव में विकास दुबे गैंग ने पुलिस पर हमला किया, जिसमें 8 पुलिसकर्मी मारे गए। खुशी बताती हैं कि वे नवविवाहिता के रूप में ससुराल आई थीं और गांव में क्या हो रहा है, यह समझ नहीं पाईं। उन्होंने कहा कि कौन जानता था कि तीन दिन की दुल्हन, जो ससुराल जा रही है, बिकरू कांड की सबसे बड़ी दोषी बन जाएगी। वे गांव से भागकर मायके जाना चाहती थीं, लेकिन पुलिस ने रोका और कहा कि अगर गईं तो शक होगा कि इसमें शामिल हैं। फोन की बैटरी डिस्चार्ज होने से परिवार को सूचना नहीं दे पाईं।
खुशी और उनके पति अमर को 3 जुलाई की रात पुलिस ने उठा लिया। 8 जुलाई को उन्हें जेल भेज दिया गया। खुशी ने बताया कि हिरासत में शुरुआती दिनों का व्यवहार "बहुत बुरा" था। वे जगह का नाम लेने से बचती हैं और कहती हैं कि जहां रखा था, क्या था, वो बहुत बुरा था। जो भी था, बहुत बुरा था। उन्होंने पुलिस पर अवैध हिरासत और यातना के आरोप लगाए हैं। उन्होंने बताया कि जेल में तबियत खराब होने से खून की उल्टी, नाक से खून, कान से खून आने लगा। लखनऊ के लोहिया अस्पताल में 11 दिन भर्ती रही।
खुशी को कुल 30 महीने जेल में रखा गया। पहले 1 साल बाराबंकी सुधार गृह (नाबालिग होने के कारण) में, फिर 18 साल होने पर कानपुर जेल में 1.5 साल। जेल में फर्श पर चादर बिछाकर सोना पड़ता था। जेल में उन्हें सादा खाना मिलता था, जिसमें चाय, डबल रोटी, दाल-चावल प्लास्टिक के मग और थाली में। कोई कुर्सी या प्लेटफॉर्म नहीं। जेल में ही पता चला कि 8 जुलाई को अमर दुबे का हमीरपुर में पुलिस एनकाउंटर में मौत हो गई। खुशी कहती हैं कि सुहागरात भी नहीं हुई। जीवन जो इच्छा से शुरू हुआ, वहीं शुरू होते ही खत्म हो गया। जेल में अमर की मां भी बंद थीं, दोनों रोती रहीं, कोई सांत्वना देने वाला नहीं था।
खुशी खुद को पूरी तरह निर्दोष बताती हैं। उनका कहना है कि वे गांव में रहती थीं (विकास दुबे के घर से 4.5 किमी दूर), गोली की आवाज सुनी लेकिन पटाखे समझा। किसी तरह लोकेशन बताने या मदद का आरोप लगा दिया गया। वे कहती हैं कि जो दोषी थे, उन्हें सजा दो, समझ आता है। लेकिन जो निर्दोष हैं, जैसे मैं और कई अन्य, उन्हें क्यों फंसाया?" पुलिस यूनिफॉर्म अब डराती है, पहले पुलिस बचना चाहती थीं।
सुप्रीम कोर्ट से सशर्त जमानत मिली, जिसमें हफ्ते में पुलिस स्टेशन जाना पड़ता है। घर पर कैमरे लगे हैं। वे सीएम योगी, पीएम मोदी से अपील करती हैं कि "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" के नाम पर मदद करें। पढ़ाई पूरी कर वकील बनना चाहती हैं ताकि निर्दोषों की मदद कर सकें। ब्राह्मण समाज से भी केस वापस लेने की मांग की।
Published on:
19 Jan 2026 11:04 am
बड़ी खबरें
View Allकानपुर
उत्तर प्रदेश
ट्रेंडिंग
