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प्रकृति की अनमोल औषधि पर लगा ग्रहण, आखरी सांसें गिन रहा दोआब का कठिया गेहूं

यमुना पट्टी और बुंदेलखंड के किसानों की आमदनी का था साधन, बिना लागत के तैयार होता है लाल कठिया गेहूं

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यमुना पट्टी और बुंदेलखंड के किसानों की आमदनी का था साधन, बिना लागत के तैयार होता है लाल कठिया गेहूं

कानपुर। यमुना पट्टी के अलावा बुंदेलखंड के दर्जनों में गांव में कभी प्रकृति की अनमोल औषधि कठिया गेहूं की चमक हुआ करती थी, जिनके आटे की बनी रोटी खाकर पहलवान और सेना के जवान बनकर युवा निकलते थे। साथ ही इसका बना दलिया और सोहन हलुआ देश ही नहीं अरब देशों में बड़े पैमाने पर भेजा जाता था। आयुर्वेद के डॉक्टरों की मानें तो कठिया गेहूं इंसान के लिए बिम फाएदे मंद है और कई रोगों के इलाज में सहायक है। लेकिन दोआब की यह दवा अब आखरी सांसें गिन रही है। किसान कम उत्पादन के चलते अब कटिया गेहूं की बोवनी खेतों में नहीं कर रहे।
लेकिन कम हुआ है तो इसका उत्पादन
यमुना पट्टी के सटे गांव, लहरीमऊ, सजेती, बरीपाल रामपुर सहित बुंदेलखंड के सभी जिलों में लाल रंग का यह गेहूं बिना रासायनिक खादों के पैदा होता है। जो स्वस्थ्य के लिए सबसे बेहतर माना जाता है। मौजूदा दौर में गेहूं कि तमाम प्रजातियों के बावजूद आज भी अपने औषधीय गुणां के कारण कठिया गेहूं की लोकप्रियता कम नहीं हुई। लेकिन कम हुआ है तो इसका उत्पादन। आपदाओं के भंवर में फंसी किसानी में सबसे ज्यादा नुकसान कठिया गेहूं को पहुंचा है। अब तो गुणाकरी दलिया और क्षेत्र के प्रसिद्ध सोहन हलुआ उत्पाद तक बनाने के लिए कठिया गेहूं कि किल्लत छा गई है।
पूरी तरह प्रकृतिक उपज
कठिया गेहूं कि उपज किसी भी तरह की खाद या अन्य संसाधन प्रयोग के बिना प्रकृति के भरोसे से तैयार होती है। जुताई कर बीज डालने के बाद प्रकृति इसे अपने तत्वों से ही सजाती-सवांरती है। लेकिन ज्यादा पैदावार दे रही दूसरी प्रजातियों के आगे अब इसका दाएरा सिमटता जा रहा है। ऐसे इलाके जहां सिंचाई के भौतिक संसाधन या फिर जमीन समतल नहीं है, वहीं कटिया गेहूं की पैदावार की जाती है। सीएसए के कृषि वैज्ञानिक अनरूद्ध दुबे बताते हैं कि इस गेहूं की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सामान्य गेहूं के मुकाबले प्रोटीन की अच्छी होती है, जो 12 से लेकर 13 प्रतिशत होती है। इसमें बीटा कैरोटीन नामक एक पदार्थ पाया जाता है, जिससे विटामिन ए बनता है, जबकि साधारण गेहूं में यह नहीं मिलता है। ऐसे में आंख की बीमारियों के लिए यह फायदेमंद होता है। इसमें ग्लूटन भी पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है। जिससे सूजी-रवा, पिज्जा, स्पेघेटी, सेवइंया, नूडल्स और शीघ्र पचन वाले पौष्टिक आहारों के लिए कठिया गेहूं बेहतर होता है।
मांग और कीमत ज्यादा
कठिया गेहूं की उपज कम होती हे। मगर सेहत के लिए अनुकूल होने से यह महंगा भी होता हैं इसकी मांग बुंदेलखंड ही नहीं बल्कि बड़े शहरों तक रहती है। डॉक्टर भी बीमारी में कठिया गेहूं का दलिया और रोटी खाने की सलाह देते हैं। वजह यह ज्यादा सुपाच्य है। हल्का लाल रंगर समेटे इस गेहूं का दलिया मधुमेह पीड़ित के लिए बेतहर भोजन है। आर्युवेद में भी यह गेहूं रामबाण माना जाता है। आर्युदक चिकित्सक डॉक्टर राजेश कुमार का कहना है कि ,,खांसी, बवासीर, पेशाब में दिक्कत व लहरूआ आदि रोगों में कटिया गेहूं का दलिया औषधीय का काम करता है। वहीं बांदा जिले का सोहन हलुआ विदेश तक प्रसिद्ध है। यह कठिया गेहूं से तैयार किया जाता है। सोहन हलुआ मी मांग देश के साथ ही विदेश तक रहती है। सजेती निवासी मिठाई व्यवसाई विकास बताते हैं कठिया गेहूं से तैयार लजीज सोहन हलुआ अरब देशों में भेजते रहते हैं। मगर मौजूदा समय किसान भौतिक साधनों का प्रयोग गेहूं की अन्य प्रजातियां उपजाने में लगे हैं। जिससे श्ुद्ध कठिया गेहूं की आमद कम हो गई है।
सबसे पहले पंजाब में उगाया गया था कठिया
सीएसए के वैज्ञानिक दनरूद्ध दुबे ने बताया कि भारत में इसकी खेती बहुत पुरानी है। पहले यह उत्तर-पश्चिम भारत के पंजाब में अधिक उगाया जाता था, इसके बाद दक्षिण भारत के कनार्टक, गुजरात के काठियावाड़ और पूर्व से पश्चिम बंगाल में फैला। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में भी इसकी बड़ी मात्रा में खेती होती थी लेकिन बदलते समय के साथ इसकी खेती कम होती चली गई। लेकिन एक बार फिर से मध्य भारत खासकर मध्यप्रेश के मालवा क्षेत्र, गुजरात के सौराष्ट और काठियावाड़, राजस्थान का कोटा , मेवाड़, उदयपुर और उत्तर पद्रेश के बुंदेलखंड में इसकी खेती होने लगी है। अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कठिया गेहूं की मांग तेजी से बढ़ रही है और स्थिति यह है कि यह साधारण गेहूं के मुकाबले इस गेहूं को 20 प्रतिशत अधिक कीमत मिल रही है। भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान, संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक कठिया गेहूं जिसे ड्यूरम गेहूं कहते हैं अपने विशिष्ट गुणों के कारण सूखा सह सकती है। असिंचित क्षेत्र में भी साधारण गेहूं के मुकाबले अधिक उपज देती है। बीमारी और कीट का प्रकोप भी इसमें नहीं लगता है, इसलिए किसानों को इसकी अधिक से अधिक खेती करनी चाहिए।

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