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शेर- इंसान के बीच यारी की अद्भुत कहानी, वन्यजीवों के नाम पर कर दी पूरी जिंदगी
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शेर- इंसान के बीच यारी की अद्भुत कहानी, वन्यजीवों के नाम पर कर दी पूरी जिंदगी

20 साल से वन्यजीवों का कर रहे इलाज, जंगलों में जाकर आदमखोर जानवरों को पकड़ने के बाद करते हैं ठीक, जंगल का राजा देखते ही मारने लगता है दहाड़।

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कानपुर। शेर का नाम सुनकर कई लोग कंपना शुरू कर देते हैं पर जब शेर अपना दोस्ताना दिखाता है तो लोग उसे देखकर दांतों तले उंगली चबाने को भी मजबूर हो जाते हैं। इन्हीं में से कानपुर चिड़ियाघर के डॉक्टर राकेश कुमार सिंह पिछले 20 सालों से शेरों के अलावा अन्य वन्यजीवों के बीच रहकर उनको संवार रहे हैं। इस वक्त जू में करीब 125 प्रकार की जीवजन्तु और पक्षी हैं, जिनकी संख्या लभगत 1400 है। इन सभी को जिंदगी बचाने का कार्य डॉक्टर सिंह के हाथों में है। इतना ही नहीं इन्हें देश के अन्य प्रणिउद्यानों में जाकर बीमार जीवजन्तुओं के इलाज के लिए बुलाया जाता है। इनके सामने आते ही आमखोर जानवर कुछ दिन के बाद इन्हें दुलार करने लगता है।

आदमखोर भी बन गए दोस्त
77हेक्टेयर में फैला कानपुर प्रणिउद्यान को बेस्ट ब्लीडिंग सेंटर के नाम से भी जाना जाता है और ये देन डॉक्टर आरके सिंह और उनकी टीम की है। यहां पर आदमखोर जानवर लाए जाते हैं और उनके स्वभाव को डॉक्टर सिंह की टीम मिलकर बदलते हैं। आज यहां अलग-अलग स्थानों से लाकर कई आदमखोर जानवर रखे गए हैं। जिस समय से ये जानवर लाए गए तक इन्हें सभंलना मुश्किल था। यहां मिले अपनामन और देखभाल ने ऐसा बना दिया कि खुंखार जानवर प्रेम की भाषा समझने लगे। डॉक्टर सिंह बताते हैं कि वन्यजीव भी प्यार को पहचानते हैं और यदि उन्हें अच्छे से पाला जाए तो वो जंगल के नियमों को छोड़ आपके बनाए गए नियमों को मानने लगते हैं। पर इसके लिए आपको समय देना होता है और ये काम हम पिछले बीस वर्षो से करते आ रहे हैं।

कौन हैं डॉक्टर सिंह
डॉक्टर आरके सिंह की शिक्षा-दिक्षा राजस्थान के बीकानेर दयानंद बाल विद्या मंदिर जो कि अब दयानन्द पब्लिक के स्कूल के रूप में जाना जाता है, से हुई थी। पिता पिता लालबहादुर इंसानों के डॉक्टर थे तो मां गृहणी थीं। पिता इन्हें इंसानों के डॉक्टर बनाना चाहते थे तो मां का लगाव वन्यजीवों से था और डॉक्टर आरके सिंह आईवीआरआई बरेली से पोस्ट ग्रेजुएट करने के बाद मां के बताए रास्ते पर अपने कदम बढ़ा दिए। बीकानेर के जन्तु से वाइल्डलाइफ की एबीसीडी सीखी और फिर जंगल के जीवों को जीवन देने के लिए जुट गए। अपने कॅरियर के दौरा डॉक्टर सिंह ने बड़े शकाहारी जानवर, गेंडा, जिराफ, बायसन सहित अन्य जीवों के घाव को बिना छुए इलाज का अविष्कार किया, जिसकी सराहना पूरे वर्ल्ड में की गई। इन्हें भारत सरकार जीवन रक्षक पदक से सम्मानित भी किया गया है।

गेंडे की मौत पर टूट गए थे सिंह
डॉक्टर आरके सिंह बताते हैं कि हमारे यहां ही राहित नाम के गेंडे का जन्म हुआ। वो मेरे साथ ही अन्य टीम के सदस्यों का दुलारा था। वो मुझे देखकर पहचान जाता था। पर ईश्वर ने मेरे इस दोस्त को मुझसे छीन लिया। रोहित गेंडे को कैंसर हो गया। हमने एक माह तक उसका इलाज किया। उसके बाड़े को अपना घर बना लिया। यहीं पर भोजन करते और गेंडे पर नजर रखते। लाख प्रयास के बाद भी हम उसे बचा नहीं पाए। रोहित गेंडे की मौत के बाद मैं पूरी तरह से टूट गया था और कई दिनों तक भोजन नहीं किया। पर भगवान के आगे विवश थे। रोहित की मौत के बाद हमनें उसकी कमीं को जल्द ही पूरा कर लिया। यहां पर एक और गेंडे ने दस्तक दी।

प्रशान्त बाघ से मिलाते हैं पंजा
जू में सबसे खुंखार जानवरों में से बाघ प्रशान्त था। इस आदमखोर को फर्रूखाबाद से 2010 में पकड़ा गया था। इस बाघ ने वहां के आठ लोगों को मार दिया था। कानपुर जू में आने के बाद इसकी स्थिति में काफी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। डॉक्टर सिंह ने बताया कि बाघ के बाड़े में जाने से यहां के कर्मचारी डरते थे। हमनें उसे देखा और फिर खुंखार बाघ को दबलने की प्रण लिया। पूरे तीन दिन इसी के बास कुर्सी में बैठे रहे और प्यार-दुलार व दवा के जरिए इसे सही रास्ते पर लाए। अब प्रशान्त हमें देखते ही पहचान जाता है और दोनों पैर खड़े कर प्यार से निहारता है। इतना ही नहीं कानपुर देहात से राजा भालू को लाया गया। इसने दो लोगों को मार दिया था। इसी साल हमलोग बरेली से बघेरा को पकड़ कर लाए हैं। इसकी पूरे इलाके में दहशत थी।

तेंदुए ने हमले से हो गए थे घायल
तेंदुआ सम्राट ने तो पांच लोगों को बुरी तरह से घायल कर दिया था। इसको पकड़ने के लिए जू से विशेष तौर पर डॉक्टर आरके सिंह को भेजा गया। तेंदुए ने उन्हें भी घायल कर दिया। मेरट अस्पताल में डॉक्टर सिंह को एडमिट करना पड़ा था। ठीक होने के बाद डॉक्टर सिंह फिर से जंगल में उतर गए और सम्राट नाम के तेंदुए का पकड़ लिया। इस सराहनीय कार्य के लिए इन्हें जीवन रक्षक पदक से सम्मानित कियरा गया था। डॉक्टर सिंह बताते हैं, अलग-अगल स्थानों से लाए गए आदमखोरों को हम यहां के प्रकृतिक वातारण में रखते हैं। प्रतिदिन उनकी पसंद का खाना देते हैं। बाड़े के अंदर उन्हें तरह-तरह के ट्रीटमेंट और इशारे समझाण् जाते हैं। साथ ही इनका ट्रायल भी लिया जाता है, कि कहीं ये हमलावर तो नहीं।

तीन साल के बाद शेर ने पहचाना
डॉक्टर आरके सिंह ने बताया कि कानपुर जू में एक शेर ने जन्म लिया और उसे लायन सफारी फेज दिया गया। उसकी परवरिस हमनें और टीम के अन्य साथियों ने की। पिछले साल सफारी में कुछ शेरों की मौत हो गई और हमें वहां बुलाया गया। जैसे ही सफारी में हमने कदम रखा तो हमारे से भेजा गया शेर हमें देखते ही पहचान गया और दहाड़ने लगा। डॉक्टर सिंह बताते हैं कि वन्यजीव को प्यार से पाला जाए तो वो अपने रवैवे का बदल देते हैं। हमलोग जब उनके बाड़े में जाते हैं तो रखे गए नाम से उन्हें पुकारते हैं। वो नाम सुनते ही चहल-कदमी करने लगते हैं। डॉक्टर सिंह ने कहा कि जंगल खत्म होने के चलते कई जीव-जन्तु विलुप्त हो गए हैं। हमें इन्हें जिंदा रखना है और इसके लिए सबको मिलकर प्रयास करने होंगे।