
कातिल का कत्ल और वादियों की मौत, लेकिन आज भी जिंदा है तारीख हुजूर
कानपुर। देश की सवा सौ करोड़ जनता आज भी न्याय के मंदिर पर विश्वास करती है। न्याय पाने के लिए चाहे उसे कितनी भी जतन क्यों न परने हो, वो डटी रहती। पर अब इसी समाज से कुछ लोग न्यायपालिका के तारीप-पे-तारीख से दुखी हैं। कानपुर देहात के बेहमई गांव में दस्यू फूलन देवी ने 20 क्षत्रीय समाज के लोगों का कर दिया था। कोर्ट में मुकदमा चला और फिर वादी व आरोपियों के बीच कचहरी में दौड़ में शुरू हो गई। करीब 38 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन बेगुनाहों के नरसंहार का इंतकाम लेने की उम्मीद अभी तक बाकी है। इनके खून से लाल हुई वहां की जमीन आज भी न्याय को बेकरार है। इस हत्याकांड के मुख्य कातिल का कत्ल हो चुका है, दर्जनों गवाहों की मौत हो गई। बावजूद इसके मुकदमा खत्म नहीं हुआ। इसके बावजूद न्याय की आस में इस केस की तारीखें बदस्तूर जारी चल रही हैं।
35 से ज्यादा पर दर्ज है मुकदमा
यह दर्दनाक घटना कानपुर देहात के सिर्फ 4० परिवारों व 178 वोटरों वाले बेहमई गांव की, जहां 14 फरवरी 1981 को दस्यु सुंदरी फूलनदेवी और उसके गैंग ने खून की होली खेली थी। बैंडिड क्वीन ने गांव के अंदर बनें कुए के पास 20 बेकसूर लोगों को लाइन में खड़ा कर बंदूक से दनादन फयार कर उन्हें दर्दनाक मौत दी थी। डकैत फूलनदेवी समेत 30-35 अन्य लोग नामजद किए गए थे। फूलन देवी के सरेंडर के बाद ये मुकदमा पिछले 38 सालों से चल रहा है। अधिकतर वादियों के साथ हत्या के आरोपियों की मौत हो चुकी है। हर माह कोर्ट में सुनवाई होती है पर फैसला अभी भी अटका हुआ है।
इनके चलते फूलन ने बोला धावा
बेहमई गांव के लोगों को तारीख याद रखने की आदत हो गई है। नरसंहार के मुकदमे की तारीख, फूलनदेवी की मौत की तारीख, ठाकुर डकैत श्रीराम की मौत की तारीख, साथ ही विकास को पत्थर रखने के लिए नेताओं के जरिए मिली तारीख। ऐसी तमाम तारीखों में बेहमई को 14 फरवरी 1981 की तारीख नहीं भूलती है। वह एक शुभ मुहुर्त था, जब गांव के राम सिह की बिटिया की बारात आई थी, लेकिन यह मुहुर्त बेहमई के लिए दुर्भाग्य बनकर आया था। उस वक्त के खूंखार डकैत श्रीराम-लालाराम की बेहमई में बंधक बनी फूलनदेवी अपने साथ कुछ दिन पहले हुए सामूहिक बलात्कार का बदला लेने के लिए गैंग के साथ गांव पहुंच चुकी थी। खबर थी कि शादी में शामिल होने के लिए श्रीराम भी आया था, लेकिन वह भाग निकला। खुन्नस में फूलन ने शनिवार की शाम ठाकुर परिवारों के बीस लोगों को एक लाइन में खड़ा करने के बाद गोलियों से भून डाला।
2012 में दाखिल हुई चार्जशीट
नरसंहार के 31 साल बाद 25 अगस्त 2०12 को कानपुर देहात की अदालत में अभियुक्तों पर चार्ज तय हुए। मुकदमा शुरू हुआ, लेकिन मुख्य अभियुक्त फूलनदेवी अब दुनिया में नहीं थी। शेरसिह राणा ने 25 जुलाई 2००1 को पूर्व दस्यु सुंदरी व मिर्जापुर की तत्कालीन सांसद फूलन देवी को नई दिल्ली में गोलियों से भून डाला था। अदालत ने बेहमई कांड के लिए दस लोगों के नाम बतौर अभियुक्त तय किए। फूलन की मौत के बाद शेष नौ में पांच हाजिर थे, जबकि चार फरार थे। एक अभियुक्त को अदालत ने घटना के वक्त नाबालिग करार देकर किशोर न्यायालय में मुकदमा स्थानांतरित कर दिया। शेष चार अभियुक्त- कोसा, भीखाराम, रामसिह और श्यामबाबू के खिलाफ सुनवाई जारी रही।
इनके दिए जख्म से रोई बेहमई
गांव के गंगा प्रसाद कहते हैं कि बेहमई का दर्द सिर्फ फूलनदेवी का दिया जख्म नहीं है, बल्कि वक्त-वक्त पर नेताओं ने इस जख्म को कुरेदकर नासूर बना दिया। 14 फरवरी 1981 के अगले दिन से शुरू हुए वादों की फेहरिस्त अंतहीन है। उस वक्त कांग्रेसी नेताओं ने बेहमई के विकास के वादे किए थे। बदलते वक्त के साथ जनता दल, फिर सपा और बसपा ने बेहमई को तमाम सपने दिखाए। सपनों के सौदागरों की सूची में भाजपा के नेताओं के नाम भी दर्ज हैं। वोटों के लालच में या चर्चित होने के लिए नेताओं के काफिले तमाम मर्तबा बेहमई की सरहद में दाखिल हुए। दर्द सुना और अपनापन जताने के साथ विकास शुरू करने की एक तारीख थमाकर लौट गए। लौटते ही वादे भूल गए और बेहमई के हिस्से में सिर्फ इंतजार आया।
नहीं मिली पेंशन
बेहमई के साथ किए फरेब की दास्तां की बानगी देखिए बतौर यूपी के मुख्यमंत्री राजनाथ सिह ने एक मर्तबा बेहमई का दौरा किया। वादा किया कि मृतकों की विधावाओं को पेंशन दी जाएगी। अरसा बाद भी आज तक वादा पूरा नहीं हुअर। फूलनदेवी के गैंग की गोली से जख्मी हुए जंतर सि हके बेटे गंगा प्रसाद कहते हैं फूलन अब इस दुनिया में नहीं हैं, पर उसके दिए जख्म पहले की तरह हरे हैं। रात में सोते वक्त वो मंजर याद कर मुझे जैसे गांव के कई लोग सिहर जाते हैं। अभी कोर्ट में जंग जारी है और जब तक न्याय नहीं मिलता हम मकुदमा लड़ते रहेंगे।
Published on:
02 Feb 2019 01:22 pm
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