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कानपुर की पारसी बिरादरी : यूपी का इकलौता मंदिर, यहां धधक रही है 1300 साल पुरानी ज्वाला

पारसियों के पूजास्थल को कहते हैं अगियारी, ईरान से लाए थे आग, देश में सिर्फ सात मंदिर, अग्नि स्थापना के लिए नौ स्थानों से लाते हैं ज्वाला

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आलोक पाण्डेय

कानपुर . ईरान से आए थे, इसलिए मुस्लिम होते हैं। मंदिर-मस्जिद नहीं जाते हैं, इसलिए क्रिश्चियन होंगे। ऐसी ही तमाम टिप्पणियां साबित कहती हैं कि पारसी बिरादरी को लेकर तमाम भ्रांतियां हैं। सच तो यह है कि पारसियों के ज्यादातर रीति-रिवाज और संस्कार हिंदुओं की तरह होते हैं। ब्राह्मण बनने के लिए जनेऊ आवश्यक है तो पारसी पंरपराओं को निभाने की योग्यता के लिए नवज्योत संस्कार जरूरी है। नवज्योत संस्कार यानी पारसी बिरादरी का जनेऊ। यह दीगर बात है कि पारसियों में लड़कियों को भी जनेऊ धारण करना पड़ता है। शादी के लिए पारसी भी सात फेरों में यकीन करते हैं और पूजा के लिए मंदिर में जाते हैं। मंदिर को अगियारी कहते हैं, क्योंकि वहां विशेष अग्नि स्थापित रहती है। कानपुर में यूपी का इकलौता पारसी मंदिर है, जहां 1300 साल पुरानी अग्नि स्थापित है। इस अग्नि को ईरान से पलायन करते समय पारसी कुनबा साथ लेकर आया था।

 

देश में सिर्फ आठ अगियारी, यूपी में इकलौती

पारसियों के पूजा-स्थल को अगियारी कहते हैं। कानपुर में पारसी बिरादरी के बीच जाना-पहचाना नाम आदिल बैरामजी बताते हैं कि सार्वजनिक पूजा-स्थल को पारसी भाषा में आतस बैहराम कहते हैं। इसके अतिरिक्त निजी प्रतिष्ठानों में स्थापित अग्नि-स्थल को डार-ए-मिहिर कहते हैं। देश में सिर्फ आठ आतस बैहराम अगियारी हैं। अगियारी में प्रज्ज्वलित अग्नि के बारे में अटूट धारण है कि सन् 650 के आसपास ईरान छोडक़र भारत में शरण लेने आए पूर्वज ईरान के सबसे बड़े अगियारी से आग लेकर आए थे। उसी ज्वाला के जरिए देश के आठ आतस बैहराम तथा 160 डार-ए-मिहिर को प्रज्ज्वलित किया गया है। कानपुर में सन् 1850 में पारसी बिरादरी का एक जत्था कारोबार के सिलसिले में आया था। वर्ष 1950 में कानपुर में पारसियों की संख्या एक हजार से ऊपर थी, जोकि फिलवक्त 60 भी नहीं है।


नौ तरह की अग्नि से तैयार होती है अगियारी

अगियारी की स्थापना के लिए जटिल और लंबी साधना होती है। अव्वल ईरान की आग के अंश के साथ-साथ लोहार, कुम्हार, सुनार, बढ़ई, किसान के घर से अग्नि को मांगा जाता है। इसके बाद किसी ऐसे स्थान पर एक साल तक खुले स्थान पर साधना होती है, जहां सर्वाधिक आकाशीय बिजली गिरती है। इस अग्नि में आकाशीय बिजली का अंश मिलने के बाद ही अगियारी की स्थापना संभव होती है। इसी जटिलता के कारण अब देश में पारसियो के नए मंदिर नहीं स्थापित होते हैं। कानपुर की अगियारी की स्थापना 1930 में हुई थी।


गुजराता के राजा ने सशर्त शरण देकर बसाया था

पारसियों के इतिहास को बयां करती किताब – किस्सा-ए-संजान में दर्ज है कि मौजूदा ईरान में किसी वक्त पारसियों का शासन था। उस दौर में ईरान को पारस के नाम से जाना जाता था। आज भी ईरान की आफिशियल भाषा फारसी है, जोकि पारसियों की भाषा पारसी का अपभ्रंश है। बहरहाल, ईरान में मुस्लिम शासकों ने कब्जा कर लिया तो पारसियो पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनने लगा। ऐसे में वर्ष 650 के आसपास जिंदगी और धर्म को बचाने के लिए ईरान छोडक़र भारत पहुंचे पारसियों ने गुजरात के तत्कालीन शासक जाणी राणा से शरण मांगी। राजा ने सांकेतिक इंकार के साथ दूध से भरा कटोरा भिजवा दिया। संदेश था कि यहां स्थान नहीं है। जवाब में पारसियों के पुजारी ने कटोरे में एक मुठ्ठी शक्कर डालकर जवाब दिया कि दूध में शक्कर की तरह घुल-मिल जाएंगे। इस हाजिर-जवाबी से खुश होकर जाणी राणा ने शर्तों के आधार पर शरण देने का फैसला किया था। मुख्य शर्तों में महिलाओं का रहन-सहन भारतीय जैसा होना, रात में शादी करना, शस्त्र नहीं रखना और धर्म-परिवर्तन की कोशिश से परहेज करना था। पारसी बिरादरी आज भी शर्तों पर कायम है। किसी दूसरे धर्म की लडक़ी यदि पारसी से ब्याह रचा लेती है तो उस लडक़ी को आजन्म पारसी बिरादरी में शामिल नहीं किया जाता है। दावा है कि देश में किसी भी पारसी के नाम शस्त्र लाइसेंस नहीं है।