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यहां जहरीले बिच्छुओं से होली खेलने की है परंपरा, सैकड़ों वर्ष से चली आ रही प्रथा, टीले का अनोखा रहस्य

लोगों का मानना है कि ये बिच्छू शुभकामनाएं देने के लिए आते हैं। बच्चे भी इन बिच्छुओं को पकड़कर खूब खेलते हैं, एक दूसरे पर फेंकते हैं।

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यहां जहरीले बिच्छुओं से होली खेलने की है परंपरा, सैकड़ों वर्ष से चली आ रही प्रथा, टीले का अनोखा रहस्य

यहां जहरीले बिच्छुओं से होली खेलने की है परंपरा, सैकड़ों वर्ष से चली आ रही प्रथा, टीले का अनोखा रहस्य

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
इटावा. रंग बिरंगे होली के पर्व (Holi Tyohar) को मनाने की परंपरा कई क्षेत्रों में भिन्न है। कहीं लट्ठमार होली तो मुर्दों की राख की होली तो कहीं गोबर की होली खेली जाती है। लेकिन इटावा जनपद के सौंथना गांव में बिच्छुओं (Scorpion Holi) से होली खेली जाती है। होली पर यहां इस बार भी लोगों ने एक दूसरे पर बिच्छू (Bichchu Holi) फेंककर होली खेली। स्थानीय लोगों के मुताबिक यहां फाग (Holi Faag) का जोरदार प्रचलन है। जैसे ही ग्रामीण फाग गांव करते हैं तो उसके थाप की आवाज से बिलों में छिपे सैकड़ों की संख्या में बिच्छू बाहर निकल आते हैं। इसके बाद गांव में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक इन बिच्छुओं से होली खेलते हैं। इसके बाद बिच्छुओं को हाथों से उठाकर एक दूसरे पर फेंकते हैं। यहां होली खेलने की परंपरा यह परंपरा अनोखी मानी जाती है।

बिच्छु होली की अनोखी परंपरा

देखा जाए तो इटावा के ताखा क्षेत्र का यह सौंथना गांव बिच्छुओं की होली के लिए चर्चा में रहता है। होली के दिन गांव में सैकड़ों बिच्छुओं को देखा जा सकता है। लेकिन ये बिच्छू किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं बल्कि लोगों का मानना है कि ये बिच्छू शुभकामनाएं देने के लिए आते हैं। बच्चे भी इन बिच्छुओं को पकड़कर खूब खेलते हैं, एक दूसरे पर फेंकते हैं। बिच्छू भी उनके शरीर पर रेंगते रहते हैं, लेकिन किसी को डंक नही मारते हैं। बताते हैं कि गांव के बाहर भैंसान नाम के टीले में ये बिच्छू रहते हैं जो होली के फल पत्थरों को हटाने पर भी नही दिखते हैं, लेकिन होली के दिन परवा पर फाग की थाप सुनकर एकसाथ सैंकड़ों की संख्या में जहरीले बिच्छू निकल पड़ते हैं। और अगले दिन टीले पर एक भी बिच्छू नजर नही आता है। सौंथना गांव की यह प्रथा सैकड़ों वर्ष पुरानी बताई जाती है।

इस टीले की है अनोखी परंपरा

गांव के प्रधान उमाकांत शुक्ला के मुताबिक भैसान टीले पर होली की परेवा को फाग गायन के समय बिच्छूओं के निकलने की परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। लोग बताते हैं कि इस टीले पर हजारों की संख्या में पड़े ईंट-पत्थर का कोई टुकड़ा यदि ले जाकर रख लें तो घर में बिच्छू निकलना शुरू हो जाते हैं। मान्यता है कि प्राचीन समय में इस टीले पर भैंसों की बलि दी जाती थी। किवदंती यह भी है कि पहले यहां पर कोई मंदिर भी था लेकिन मुगलों के समय युद्ध में उसे ध्वस्त कर दिया गया। यहां आज भी मूर्तियों के टूटे अवशेष मिलते हैं। उमाकांत बताते हैं आज भी गांव के लोग इस टीले को भैसान बाबा के रूप में पूजते हैं। गांव में किसी की भी शादी के समय इस टीले पर तेल चढ़ाने की पंरपरा है। लोग यहां आकर मन्नत भी मानते हैं और पूरी होने पर पूजा अर्चना करते हैं।