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इंद्रजीत सरोज और अंटू मिश्रा भी छोड़ सकते हैं बसपा

जिस तरह से बसपा के सुप्रीमो मायावती के खिलाफ उन्हीं के वफादार एक - एककर पार्टी छोड़ रहे हैं।

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Ankur Singh

Jul 01, 2016

mayawati

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विनोद निगम
कानपुर।
जिस तरह से बसपा के सुप्रीमो मायावती के खिलाफ उन्हीं के वफादार एक - एककर पार्टी छोड़ रहे हैं। इससे साफ झलकता है कि बसपा के अंदर जमकर गृह युद्व चल रहा है। कयास यह भी लगाए जा रहे हैं कि बसपा के गठन के समय साथ रहे और बहन जी के खास इंद्रजीत सरोज भी कुछ दिन में पार्टी से रिजाइन कर सकते हैं। जिसकी पुष्टि मायावती के हर कदम पर साथ चलने वाले पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद ने की है। अगर दद्दू प्रसाद की बात पर अमल किया जाए तो उनका यह भी कहना है कि आज नहीं तो कल अंटू मिश्रा भी बसपा से नाता तोड़ सकते हैं।


दद्दू प्रसाद ने बताया कि जिस काशीराम के दल को बहन जी ने रियल स्टेट की पार्टी बना दी है। इससे उस समाज के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात किया गया है जो तीन दशक से बसपा के साथ मजबूती से खड़ा रहा। दद्दू प्रसाद ने कहा कि चलिए बहन जी के रियल स्टेट कंपनी से पहले स्वामी प्रसाद मौर्या और आरके चौधरी से रिजाइन कर बाहर आए हैं अब हम मिलकर बहुजन समाज के उत्थान के लिए एकमंच बनाकर यूपी 2017 का चुनाव लड़ेंगे। दद्दू प्रसाद ने कहा कि जिस तरह मुलायम सिंह को अमर सिंह ने 2007 में डुबोया था, इसी तरह नसमुद्दीन सिद्दकी बहन जी को पहले 2012 विधानसभा और फिर लोकसभा में जीरो तक पहुंचाया।


सिद्दीकी के कहने पर काटा गया था टिकट


जब बसपा का गठन हुआ था तब एक युवा नेता आदित्य पांडेय ने फतेहपुर जिले की जहानाबाद विधानसभा में दबंगों के खिलाफ खड़े होकर लड़ाई लड़ी। पहले दलितों की मैला ढोने की प्रथा के लिए सड़क पर उतरकर लड़ाई की। बसपा से तीन बार चुनाव लड़ा, लेकिन दो बार उन्हें हार मिली। लेकिन कुर्मी बहूल्य सीट से पांडेय ने 2007 में सपा के कद्दावर नेता मदन गोपाल उमराव को हराया था। पांडेय ने अपनी विधायकी के दौरान दलितों को जमीन दिलवाई, स्कूल से लेकर गांव - गांव सड़क बनवाई। लेकिन नसीमुद्दीन सिद्दकी की चाटुकारी नहीं की, जिसका खामियाजा उन्हें 2012 में उठाना पड़ा। नसीमुद्दीन के कहने पर नामंकन के महज पंद्रह दिन पहले उनका टिकट काट कर एक व्यापारी को दे दिया गया। पूर्व विधायक ने बताया कि आज बसपा की जो दुर्गति हो रही है, इसके पीछे सिर्फ एक आदमी का हाथ है, जिसका नाम नसीमुद्दीन सिद्दकी है।


स्वामी और चौधरी हटे नहीं हटवाए गए


कानपुर से बसपा की नुमाइंदी करने वाले पूर्व विधायक अनिल शुक्ल वारसी ने कहा कि दद्दू प्रसाद, कुशवाहा से लेकर स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ ही आरके चौधरी दल से हटे नहीं, हटाए गए हैं। वारसी ने कहा कि बहन जी यूपी के लगभग पांच करोड़ मतदाताओं के साथ 2012 में छल किया है, जिसे उन्हें लोकसभा चुनाव में देखने को मिला। जहां पहले बसपा 22 सीटों पर थी वहीं शून्य पर सिमट गई। इतना ही नहीं जिस मतदाताओं के दम पर बहन जी घमंड करती हैं कर बसपा के जमीन से जुड़े उम्मीदवारों के टिकट काट कर रुपए देने वालों को टिकट देती हैं, यह मतदाता अब जान चुके हैं। बहन जी को यही मतदाता 2017 के चुनाव में तीसरी बार सबक सिखा देंगे। शुक्ल के मुताबिक बहन जी से बात करने से पहले उनके चाटुकारों से जी हूजूरी करनी पढ़ती है। अगर वह खुश हो गए तो बहन जी तक बड़ी मुश्किल से बात पहुंचती है। स्वामी प्रसाद मौर्या और चौधरी हमारे बड़े भाई की तरह हैं और वह जमीन से जुड़े नेता हैं। शुक्ला के मुताबिक अभी तो यह शुरुआत है, बसपा से कई बड़े दिग्गज जल्द ही पार्टी से किनारा करेंगे।


न कभी जीते बेटा भी चुनाव हारा


बुंदेलखंड से कभी मायवती के दो शेर हुआ करते थे। वह जो बात मायावती से कह दे कभी न नहीं होती थी। इनमें से दद्दू प्रसाद मायावती के समाज से ताल्लुख रखते हैं और वह काशीराम के काभी नजदीक थे। वहीं कुशवाहा की भी पकड़ सीधे काशीराम से थी और 2007 के चुनाव में बपसा को 19 में से 16 सीटों पर जीत इन्हीं दोनों के बल पर मिली थी। लेकिन जिस दिन से यह दोनों नेता बसपा से हटे, बुंदेलखंड में बपसा के ग्राफ में जबरदस्त गिरावट आई है। दद्दू प्रसाद ने बताया कि जिस नसीमुद्दीन सिद्दकी के बल पर बहन जी ने 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा था, उसका नतीजा सामने है। दद्दू प्रसाद ने बताया कि 1991 में नसीमुद्दीन बांदा सदर से चुनाव लड़़े थे, जहां वह बुरी तरह पराजित हुए थे। वहीं बेटे को लोकसभा में उतारा वह भी जीत नहीं सका। वहीं पूरे मामले पर कानपुर मंड़ल के कोआर्डिनेटर व बसपा मेता नसीमुद्दीन सिद्दकी से स्वामी के बाग चौधरी के बसपा से चले जाने पर पूछा गया तो उनका कहना था कि मैं अभी दिल्ली में हूं, तीन जुलाई को सारे आरोपों का जवाब दूंगा।

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